गुरुवार, 10 नवंबर 2011

कार्तिक पूर्णिमा के दिन शिव त्रिपुरारि बने

भारतीय संस्कृति में कार्तिक मास की पूर्णिमा का धार्मिक एवं आध्यात्मिक माहात्म्य है। दीपावली, यम द्वितीया और गोवर्धनपूजा के अलावा इस मास के सांस्कृतिक पर्वो में यह पर्व असीम आस्था का संचार करता है। वर्ष के बारह महीनों में यह कार्तिक मास धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से विशेष महत्व का है। इसे त्रिपुरीपूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान तथा दीपदान की प्राचीन परम्परा है। अयोध्या में सरयू में स्नान करने के लिए जन-समुद्र उमड पडता है। सूर्यास्त काल में सरयू तट पर दीप पंक्तियां मनोहारी लगती है। गंगातटपर अनगिनत नर नारी श्रद्धाभिभूतहोकर अवगाहन लगाते हैं। हरिद्वार, काशी, प्रयाग, राजघाट, गढमुक्तेश्वर,विदुरकुटीकानपुर, अनूप शहर में गंगा में स्नान कर अपार जनमानस आह्लादितहोता है।

कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन कृतिका नक्षत्र रहने पर महाकार्तिकीपूर्णिमा का अटूट विश्वास है। भरणी नक्षत्र में पडने पर विशेष फलदायक एवं रोहिणी नक्षत्र के रहने पर इस महापर्वका फल और संविर्द्धतहो जाता है। इस दिन कृत्तिका चन्द्रमा और विशाखाका सूर्य होने पर पदमकयोग रहता है। यह पुष्कर में भी दुर्लभ होता है। प्राचीन मान्यता के अनुसार सांय बेला में इसी दिन भगवान का मत्स्यावतार हुआ था। इस पर्व पर किए गए दान कार्य का फल दस यज्ञ के समान होता है। इसी दिन शिव त्रिपुरारि बने थे। शिव ने इस दिन त्रिपुर नामक असुर को मारा था। प्राचीन साहित्य के अनुसार देवताओं की रक्षा के लिए शिव को यह कार्य करना पडा था। त्रिपुर ने एक लाख वर्ष तक तीर्थराज प्रयाग में कठोर तप साधना की। उसके तेज चराचर प्राणी भस्मीभूतहोने लगे देवताओं ने अप्सराओं को भेजकर भी असफलता ही पायी। ब्रह्मा के आने पर उसने अमर होने का वरदान मांगा। ब्रह्माजीने असमर्थता व्यक्त की तो उसने मनुष्य या देव द्वारा मरने का वरदान मांगा।

फिर क्या था? त्रिपुर देवों को अपने द्वार रक्षक के रूप में रखने लगा। सूर्य का भी अपमान करने से नहीं चूका। सूर्य ने उसके नगर को अपने प्रताप से भस्म कर दिया। नारद मुनि भ्रमण करते हुए त्रिपुर के यहां पहुंचे। त्रिपुर ने स्वागत के अनन्तर नारद से पूछा-मेरे समान क्या कोई दूसरा प्रतापी असुर है। नारद के इनकार करने पर त्रिपुर का अहं बढ गया। नारद जी देवलोक में पहुंचकर यह सब बताया। ब्रह्मा इन्द्र मिलकर भगवान विष्णु के पास गए। क्षीर सागर पहुंचने पर विष्णु ने बताया कि ब्रह्मा ही सबके दुख देने वाले हैं। ब्रह्मा का त्रिपुर ने वरदान पाया है। नारद ने बताया जो देवता, राक्षस, नर-नारी हो जिसके माता-पिता हों वही उसे मार पाएगा। विष्णु ने बताया यह सब शंकर जी में है, उनसे सब मिलकर प्रार्थना करें। देवताओं की प्रार्थना पर शिव त्रिपुर का वध करने के लिए तैयार हो गए। नारद से जानकर त्रिपुर ने महादेव के कैलाश पर्वत पर आक्रमण कर दिया। त्रिपुर और शंकर में संघर्ष बढ गया। शिव धनुष से जिन असुरों को मारते थे, वे त्रिपुर के विमान में रखे अमृतकुण्डमें स्नान कर पुनर्जीवित हो उठते थे। महादेव विपत्ति में पड गए।

विष्णु और ब्रह्मा बछडे तथा गाय का रूप बनाकर त्रिपुर के विमान में पहुंच गये। अमृत रक्षक दोनों को देखकर सम्मोहित हुए। दोनों ने सारा अमृत पी डाला। लौटने पर शिव ने सारी बात बताने पर शिव ने पुन:वाणों द्वारा असुर कुल के साथ त्रिपुर की त्रयपुरीको भी विनष्ट कर दिया। त्रिपुर के वध का कारण ही शिव को त्रिपुरारि नाम दिया गया। इसी स्मृति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। भारतीयता की यह अनूठी पहचान है। कार्तिक मास में धर्मनिष्ठ नारियां नदी सरोवर या जलाशयों में स्नान से संबंधित प्रेरक प्रसंग मालवीलोकगीतों में प्रस्तुत करतीं हैं। सांय काल कार्तिक स्नान के अनंतर पूजा-अर्चना के आयाम से जुडी है।

गंगा, सरयू, गोमती तट पर अनगिनत दीप समस्त लोकसंस्कृतिके ज्योतिपुंजबनते हैं। श्रीकृष्ण के भक्ति गीतों से आते-प्रोत कार्तिकमासपूर्णिमा का पर्व अनन्य भक्ति भावना का अजस्त्र स्त्रोत है। स्त्रियां कार्तिकमासमें नंगे पैर पुष्पार्जनके निमित्त प्रात:उठकर शिप्रा,गंगा, सरयू या पास की नदी में स्नान करतीं हैं।

इसके बाद विप्रों द्वार उपासना की विशिष्ट परंपरा है। धर्म निष्ठ नारियां भक्ति भावनाओं द्वारा सत्य, कर्म का पालन करती हैं। अशक्त वृद्ध श्रद्धालुओं को कार्तिक पूर्णिमा जीवन्ततादेती है। कार्तिक मास की पूर्णिमा भक्ति भावना की असीम धारा अध्यात्म नव संदेश भी देता है।

डा हरिप्रसाद दुबे