इस महीने में हरिद्वार की गंगा और कामना ज्योतिर्लिग के नाम से जाना जानेवाला सुप्रसिद्ध तीर्थस्थल देवघर की महिमा और भी बढ़ जाती है। शिव और शक्ति का सगम स्थल देवघर आदिकाल से ही पूजित है। वैसे तो सालभर तीर्थयात्री बाबा का जलाभिषेक करने देवघर पहुंचते है, लेकिन सावन की छटा कुछ अलग है। सावन में बाबा को जल चढ़ाने का अलग महत्व है। इसलिए एक महीने तक बाबाधाम में देश-विदेशों के कावरिये सुल्तानगज से कावर लिए बाबाधाम पहुचते है। इसके अलावा हरिद्वार में भी एक महीने तक कांवरिये का तांता लगा रहता है।
सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है। सत्य अर्थात भगवान विष्णु, शिव अर्थात मंगलकारी और दोनों का एक-दूसरे के प्रति समर्पित भाव ही सृष्टि की सुंदरता है। शिव के प्रति अपना समर्पण दिखाने के लिए भगवान राम ने ही कावर उठाने की परंपरा शुरू की थी। रावण की मौत के बाद शिव और राम में संघर्ष हुआ। दोनों तो बाद में मिल गए परंतु शिव के भूत-प्रेत और राम के रीछ-वानर आपस में झगड़ते रहे। इस झगड़े को शात कराने के लिए भगवान राम ने कई स्थानों पर शिव की पूजा की। सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भर कर कावर ले अपनी अद्र्धागिनी सीता, हनुमान और चारों भाइयों के साथ उन्होंने रावणेश्र्र्वर महादेव पर जल चढ़ाया। तब से श्रावण माह में सुल्तानगंज से जल भर कर देवघर जाने की परंपरा शुरू हो गई। ऐसा माना जाता है कि सर्वप्रथम कावर परंपरा की शुरुआत मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने ही की थी। रामायण काल से जुड़े स्थलों की खोज में लगी श्री रामायण रिसर्च कमेटी की टीम के अनुसार रावण के वध के उपरात भगवान श्रीराम ने लंका में शिवलिंग की स्थापना की थी जिसे आज मानवरी रामलिंगम के नाम से जाना जाता है।
श्रावण मास में शिव को गंगाजल चढ़ाने के पीछे भी एक रहस्य है। इसी मास में समुद्र मंथन से निकले हलाहल का भगवान शिव ने पान किया था। उसकी जलन को दूर करने के लिए सावन में भगवान शिव को गंगाजल चढ़ाने की परंपरा चल रही है, इसी कारण भगवान राम ने भी कावर ढोने की परंपरा की शुरुआत सावन में ही की थी। रावण हरिद्वार से गंगाजल लाकर भगवान शिव को अर्पित करता था, लेकिन सुल्तानगंज-देवघर कावरिया पथ को अमर बनाने के लिए भगवान राम का नाम लिया जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार जो नर-नारी कावर लेकर भगवान शिव को गंगाजल चढ़ाते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। राम की शिवभक्ति के पीछे के कारणों की चर्चा के दौरान रामधारी सिंह दिनकर के संस्कृति के चार अध्याय की चर्चा करना प्रासंगिक होगा।
पहले शैव और वैष्णव संप्रदाय के लोग एक-दूसरे को फूटी आख भी नहीं देखना चाहते थे। वाल्मीकि रामायण में भी भगवान शिव और विष्णु के बीच हुए युद्ध की चर्चा है। भगवान राम ने समाज में समरसता कायम करने के लिए शिवभक्ति की परंपरा शुरू की। रामचरितमानस में भी तुलसीदास ने भगवान राम से कहलवाया है-शिव द्रोही मम शत्रु कहावा।
source : dainikjagran.com

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