सोमवार, 9 जुलाई 2012

क्यों रखना चाहिए सावन सोमवार के व्रत?


हिन्दू धर्म में सोमवार के दिन व्रत रखने का महत्व बताया गया है। यह शिव उपासना से कामनासिद्धि के लिए प्रसिद्ध है। खासतौर पर शिव भक्ति के विशेष काल सावन माह के सोमवार साल भर के सोमवार व्रतों का पुण्य देने वाले माने गए हैं।  किंतु सोमवार व्रत रखने की एक ओर खास वजह भी है, जानिए -

ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक यह दिन कुण्डली में चंद्र ग्रह के बुरे योग से जीवन में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए भी अहम है। दरअसल, चंद्र मानव जीवन और प्रकृति पर असर डालता है और चंद्र के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए ही सोमवार को चंद्र पूजा और व्रत का महत्व बताया गया है। डालिए चंद्रमा के होने वाले प्रभावों पर एक नजर -

विज्ञान के मुताबिक पृथ्वी समेत अन्य सभी ग्रह सूर्य के चक्कर लगाते हैं। वहीं चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है, क्योंकि वह ग्रह न होकर एक उपग्रह है। व्यावहारिक जीवन में भी हम देखते हैं कि चन्द्रमा मानव जीवन के साथ-साथ साथ-साथ पूरे जगत पर ही प्रभाव डालता है।  इसका प्रमाण है पूर्णिमा की रात जब चन्द्रमा पूर्ण आकार में दिखाई देता है, तब समुद्र में आता है ज्वार। वहीं जब अमावस्या के आस-पास चन्द्रमा अदृश्य होता है, तब समुद्र पूरी तरह शांत रहता है। इस प्रकार आकाश में चन्द्रमा के आकार घटने-बढऩे के साथ-साथ पानी और अन्य तरल पदार्थों में हलचल भी कम-ज्यादा होने लगती है।

ज्योतिष विज्ञान कहता है कि चन्द्रमा हमारी पृथ्वी के सबसे नजदीक है और अपनी निकटता के कारण ही हमारे जीवन के हर कार्य व्यवहार पर सबसे अधिक असर डालता है। यही वजह है कि जिन लोगों में जल तत्व की प्रधानता होती है, वे पूर्णिमा के आस-पास अधिक आक्रामक, क्रोधित और उद्दण्ड बने रहते हैं। जबकि अमावस्या के आस-पास एकदम शांत और गंभीर देखे जाते हैं।

खासतौर पर जलतत्व राशि जैसे मीन, कर्क, वृश्चिक वाले स्त्री-पुरुषों को सोमवार का व्रत और चन्द्रदेव का पूजन तो जरूर करना ही चाहिए। मानसिक शांति, मन की चंचलता को रोकने और दिमाग को संतुलित रखने के लिए तो चन्द्रदेव के निमित्त किए जाने वाला सोमवार का व्रत ही श्रेष्ठ उपाय है। चंद्रदोष शांत के लिए स्फटिक की माला पहनना तथा मोती का धारण करना शुभ होता है।

धार्मिक दृष्टि से चूंकि शास्त्रों में भगवान शिव चन्द्रमौलेश्वर यानी दूज के चांद को मस्तक पर धारण करने वाले बताए गए हैं। शिव कृपा से ही चंद्रदेव ने फिर से सौंदर्य को पाया। इसलिए सोमवार को व्रत रख शिव पूजा से चंद्र पूजा होने के साथ चंद्र दोष और रोग भी दूर हो जाते हैं। 



निराली है शिव की महिमा

मान्यता है कि भगवान शिव संसार के समस्त मंगल का मूल हैं। यजुर्वेद में उनकी स्तुति इस प्रकार की गई है- नम: शंभवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च॥ इस वैदिक ऋचा में परमात्मा को 'शिव', 'शंभु' और 'शंकर' नाम से नमन किया गया है। 'शिव' शब्द बहुत छोटा है, पर इसके अर्थ इसे गंभीर बना देते है। 'शिव' का व्यावहारिक अर्थ है 'कल्याणकारी'। 'शंभु' का भावार्थ है 'मंगलदायक'। 'शंकर' का तात्पर्य है 'आनंद का श्चोत'। यद्यपि ये तीनों नाम भले ही भिन्न हों, लेकिन तीनों का संकेत कल्याणकारी, मंगलदायक, आनंदघन परमात्मा की ओर ही है। वे देवाधिदेव महादेव, सबके अधिपति महेश्वर सदाशिव ही है। परंतु यह ध्यान रहे कि भगवान 'शिव' त्रिदेवों के अंतर्गत रुद्र [रौद्र रूप वाले] नहीं हैं।
भगवान शिव की इच्छा से प्रकट रजोगुण रूप धारण करने वाले ब्रहृमा, सलवगुणरूप विष्णु एवं तमोगुण रूप रुद्र है, जो क्रमश: सृजन, रक्षण [पालन] तथा संहार का कार्य करते है। ये तीनों वस्तुत: सदाशिव की ही अभिव्यक्ति है, इसलिए ये शिव से पृथक भी नहीं हैं। ब्रहृमा-विष्णु-महेश तात्विक दृष्टि से एक ही है। इनमें भेद-करना अनुचित है।
दार्शनिक मान्यता है कि ब्रहृमांड पंचतत्वों से बना है। ये पांच तत्व है- जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश। भगवान शिव पंचानन अर्थात पांच मुख वाले है। शिवपुराण में इनके इसी पंचानन स्वरूप का ध्यान बताया गया है। ये पांच मुख- ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात नाम से जाने जाते है। भगवान शिव के ऊ‌र्ध्वमुख का नाम 'ईशान' है, जिसका दुग्ध जैसा वर्ण है। 'ईशान' आकाश तत्व के अधिपति है। ईशान का अर्थ है सबके स्वामी। ईशान पंचमूर्ति महादेव की क्रीड़ामूर्ति हैं। पूर्वमुख का नाम 'तत्पुरुष' है, जिसका वर्ण पीत [पीला] है। तत्पुरुष वायु तत्व के अधिपति है। तत्पुरुष तपोमूर्ति हैं। भगवान सदाशिव के दक्षिणी मुख को 'अघोर' कहा जाता है। यह नीलवर्ण [नीले रंग का] है। अघोर अग्नितत्व के अधिपति है। अघोर शिवजी की संहारकारी शक्ति हैं, जो भक्तों के संकटों को दूर करती है। उत्तरी मुख का नाम वामदेव है, जो कृष्णवर्ण का है। वामदेव जल तत्व के अधिपति है। वामदेव विकारों का नाश करने वाले है, अतएव इनके आश्रय में जाने पर पंचविकार काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह नष्ट हो जाते है। भगवान शंकर के पश्चिमी मुख को 'सद्योजात' कहा जाता है, जो श्वेतवर्ण का है। सद्योजात पृथ्वी तत्व के अधिपति है और बालक के समान परम स्वच्छ, शुद्ध और निर्विकार है। सद्योजात ज्ञानमूर्ति बनकर अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करके विशुद्ध ज्ञान को प्रकाशित कर देते है। पंचभूतों [पंचतत्वों] के अधिपति होने के कारण ये 'भूतनाथ' कहलाते है।
शिव-जगत में पांच का और भी महत्व है। रुद्राक्ष सामान्यत: पांच मुख वाला ही होता है। शिव-परिवार में भी पांच सदस्य है- शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदी। शिवजी की उपासना पंचाक्षर मंत्र- 'नम: शिवाय' द्वारा की जाती है। शिव काल (समय) के प्रवर्तक और नियंत्रक होने के कारण 'महाकाल' भी कहलाते है। काल की गणना 'पंचांग' द्वारा होती है। काल के पांच अंग- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण शिव के ही अवयव है।
शिव जी करुणासिंधु, भक्तवत्सल होने के कारण भक्त की भावना के वशीभूत होकर उसकी मनोकामना पूर्ण कर देते है, पर यह स्मरण रहे कि 'देवो भूत्वा यजेत् देवं।' अर्थात अपने इष्टदेव की अर्चना करने के लिए पहले अपने आपको उनके अनुरूप बनाओ। इसलिए 'शिवो भूत्वा शिवं यजेत्' को अपने आचरण में ढाल लें। शिवार्चन तभी सफल होगा, जब भक्त शिव के समान ही त्यागी, परोपकारी, संयमी, साधनाशील और सहिष्णु होगा। श्रुतियों में कहा गया है कि शिव ही समस्त प्राणियों के अंतिम विश्राम के स्थान है। वेदों, पुराणों और उपनिषदों में शिव को ही सच्चिदानंद घन परब्रहृम कहा गया है। यही कारण है कि निर्गुण निराकार शिवलिंग-रूप तथा सगुण-साकार मूर्तिरूप, दोनों तरह से शिव जी का पूजन होता है।

'वृष' का शाब्दिक अर्थ धर्म (जिसे हम धारण करते हैं अर्थात हमारे कर्तव्य) भी है। भगवान शंकर धर्म अर्थात कर्तव्यों के भी अधिपति है।? शिवजी की आराधना में कर्मकांड की जटिलता नहीं, वरन भावना की प्रधानता है। वे अतिशीघ्र प्रसन्न हो जाते है। इसी कारण वे 'आशुतोष' कहलाते है। जिस प्रकार हलाहल (विष) को पीकर उन्होंने देवताओं को संकट से बचाया और 'नीलकंठ' बन गए, उसी तरह उनके भक्तों को भी उनका अनुसरण करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
शिव-तत्व को जीवन में उतार लेना ही शिवत्व प्राप्त करना है और यही शिव होना है। हमारा लक्ष्य भी यही होना चाहिए। तभी शिवार्चन सफल होगा और सावन का पूरा लाभ मिलेगा।

क्या है शिव के गले के नाग का रहस्य?


भगवान शिव के विराट स्वरूप की महिमा बताते शिव पञ्चाक्षरी स्तोत्र की शुरुआत में शिव को 'नागेन्द्रहाराय' कहकर स्तुति की गई है, जिसका सरल शब्दों में अर्थ है, ऐसे देवता जिनके गले में सर्प का हार है। यह शब्द शिव के दिव्य और विलक्षण चरित्र को उजागर ही नहीं करता बल्कि जीवन से जुड़ा एक सूत्र भी सिखाता है।

शास्त्रों के मुताबिक शिव नागों के अधिपति है। दरअसल, नाग या सर्प कालरूप माना गया है। क्योंकि वह जहरीला व तामसी स्वभाव का जीव है। नागों का शिव के अधीन होना यही संकेत है कि शिव तमोगुण, दोष व विकारों के नियंत्रक व संहारक हैं, जो कलह का कारण ही नहीं बल्कि जीवन के लिए घातक भी होते हैं। इसलिए वह प्रतीक रूप में कालों के काल भी पुकारे जाते हैं और शिव भक्ति ऐसे ही दोषों को दूर करती है। इन बातों में जीवन से जुड़ा एक सबक है।

शिव का नागों का हार पहनना व्यावहारिक जीवन के लिए भी यही संदेश देता है कि अगर ज़िंदगी को तबाह करने वाले कलह और कड़वाहट रूपी घातक जहर से बचाना है तो मन, वचन व कर्म से द्वेष, क्रोध, काम, लोभ, मोह, मद जैसे विकारों व बुरी आदत रूपी नागों पर काबू रखें। सरल शब्दों में कहें तो साफ छवि और संयम भरी जीवनशैली से जीवन को शिव की तरह निर्भय, निश्चिंत व सुखी बनाएं।

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ऐसे करें शिव को प्रसन्न


श्रावण मास में आने वाले सोमवार के दिनों में भगवान शिवजी का व्रत करना चाहिए और व्रत करने के बाद भगवान श्री गणेश जी, भगवान शिवजी, माता पार्वती व नन्दी देव की पूजा करनी चाहिए। पूजन सामग्री में जल, दुध, दही, चीनी, घी, शहद, पंचामृ्त,मोली, वस्त्र, जनेऊ, चन्दन, रोली, चावल, फूल, बेल-पत्र, भा ंग, आक-धतूरा, कमल,गट्ठा, प्रसाद, पान-सुपारी, लौंग, इलायची, मेवा, दक्षिणा चढाया जाता है।
वर्ष 2012 में यह माह 3 जुलाई से प्रारम्भ होकर 2 अगस्त के मध्य अवधि में रहेगा। इस दिन धूप दीया जलाकर कपूर से आरती करनी चाहिए। व्रत के दिन पूजा करने के बाद एक बार भोजन करना चाहिए। और श्रावण मास में इस माह की विशेषता का श्रवण करना चाहिए।

श्रावण मास शिव उपासना महत्व:-

भगवान शिव को श्रावण मास सबसे अधिक प्रिय है। इस माह में प्रत्येक सोमवार के दिन भगवान श्री शिव की पूजा करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। इस मास में भक्त भगवान शकर का पूजन व अभिषेक करते है। सभी देवों में भगवान शकर के विषय में यह मान्यता प्रसिद्ध है, कि भगवान भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते है। एक छोटे से बिल्वपत्र को चढ़ाने मात्र से तीन जन्मों के पाप नष्ट होते है।
श्रावण मास के विषय में प्रसिद्ध एक पौराणिक मान्यता के अनुसार श्रावण मास के सोमवार व्रत, एक प्रदोष व्रत तथा और शिवरात्री का व्रत जो व्यक्ति करता है, उसकी कोई कामना अधूरी नहीं रहती है। 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के समान यह व्रत फल देता है।

इस व्रत का पालन कई उद्देश्यों से किया जा सकता है। महिलाएं श्रावण के 16 सोमवार के व्रत अपने वैवाहिक जीवन की लंबी आयु और संतान की सुख-समृ्दि्ध के लिये करती है, तो यह अविवाहित कन्याएं इस व्रत को पूर्ण श्रद्वा से कर मनोवाछित वर की प्राप्ति करती है। सावन के 16 सोमवार के व्रत कुल वृद्धि, लक्ष्मी प्राप्ति और सुख -सम्मान के लिये किया जाता है।


शिव पूजन में बेलपत्र प्रयोग करना:-

भगवान शिव की पूजा जब बेलपत्र से की जाती है, तो भगवान अपने भक्त की कामना बिना कहे ही पूरी करते है. बिल्व पत्र के बारे में यह मान्यता प्रसिद्ध है, कि बेल के पेड़ को जो भक्त पानी या गंगाजल से सींचता है, उसे समस्त तीथरें की प्राप्ति होती है। वह भक्त इस लोक में सुख भोगकर, शिवलोक में प्रस्थान करता है। बिल्व पत्थर की जड़ में भगवान शिव का वास माना गया है। यह पूजन व्यक्ति को सभी तीथरें में स्नान करने का फल देता है।

सावन माह व्रत विधि:-

सावन के व्रत करने से व्यक्ति को सभी तीथरें के दर्शन करने से अधिक पुन्य फल प्राप्त होते है। जिस व्यक्ति को यह व्रत करना हो, व्रत के दिन प्रात: काल में शीघ्र सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। श्रावण मास में केवल भगवान श्री शकर की ही पूजा नहीं की जाती है, बल्कि भगवान शिव की परिवार सहित पूजा करनी चाहिए। सावन सोमवार व्रत सूर्योदय से शुरु होकर सूर्यास्त तक किया जाता है। व्रत के दिन सोमवार व्रत कथा सुननी चाहिए। तथा व्रत करने वाले व्यक्ति को दिन में सूर्यास्त के बाद एक बार भोजन करना चाहिए।
प्रात:काल में उठने के बाद स्नान और नित्यक्त्रियाओं से निवृ्त होना चाहिए। इसके बाद सारे घर की सफाई कर, पूरे घर में गंगा जल या शुद्ध जल छिड़कर, घर को शुद्ध करना चाहिए। इसके बाद घर के ईशान कोण दिशा में भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करना चाहिए। मूर्ति स्थापना के बाद सावन मास व्रत संकल्प लेना चाहिए।
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चल पड़े कांवरिये


इस महीने में हरिद्वार की गंगा और कामना ज्योतिर्लिग के नाम से जाना जानेवाला सुप्रसिद्ध तीर्थस्थल देवघर की महिमा और भी बढ़ जाती है। शिव और शक्ति का सगम स्थल देवघर आदिकाल से ही पूजित है। वैसे तो सालभर तीर्थयात्री बाबा का जलाभिषेक करने देवघर पहुंचते है, लेकिन सावन की छटा कुछ अलग है। सावन में बाबा को जल चढ़ाने का अलग महत्व है। इसलिए एक महीने तक बाबाधाम में देश-विदेशों के कावरिये सुल्तानगज से कावर लिए बाबाधाम पहुचते है। इसके अलावा हरिद्वार में भी एक महीने तक कांवरिये का तांता लगा रहता है।

सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है। सत्य अर्थात भगवान विष्णु, शिव अर्थात मंगलकारी और दोनों का एक-दूसरे के प्रति समर्पित भाव ही सृष्टि की सुंदरता है। शिव के प्रति अपना समर्पण दिखाने के लिए भगवान राम ने ही कावर उठाने की परंपरा शुरू की थी। रावण की मौत के बाद शिव और राम में संघर्ष हुआ। दोनों तो बाद में मिल गए परंतु शिव के भूत-प्रेत और राम के रीछ-वानर आपस में झगड़ते रहे। इस झगड़े को शात कराने के लिए भगवान राम ने कई स्थानों पर शिव की पूजा की। सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भर कर कावर ले अपनी अद्र्धागिनी सीता, हनुमान और चारों भाइयों के साथ उन्होंने रावणेश्‌र्र्वर महादेव पर जल चढ़ाया। तब से श्रावण माह में सुल्तानगंज से जल भर कर देवघर जाने की परंपरा शुरू हो गई। ऐसा माना जाता है कि सर्वप्रथम कावर परंपरा की शुरुआत मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने ही की थी। रामायण काल से जुड़े स्थलों की खोज में लगी श्री रामायण रिसर्च कमेटी की टीम के अनुसार रावण के वध के उपरात भगवान श्रीराम ने लंका में शिवलिंग की स्थापना की थी जिसे आज मानवरी रामलिंगम के नाम से जाना जाता है।
श्रावण मास में शिव को गंगाजल चढ़ाने के पीछे भी एक रहस्य है। इसी मास में समुद्र मंथन से निकले हलाहल का भगवान शिव ने पान किया था। उसकी जलन को दूर करने के लिए सावन में भगवान शिव को गंगाजल चढ़ाने की परंपरा चल रही है, इसी कारण भगवान राम ने भी कावर ढोने की परंपरा की शुरुआत सावन में ही की थी। रावण हरिद्वार से गंगाजल लाकर भगवान शिव को अर्पित करता था, लेकिन सुल्तानगंज-देवघर कावरिया पथ को अमर बनाने के लिए भगवान राम का नाम लिया जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार जो नर-नारी कावर लेकर भगवान शिव को गंगाजल चढ़ाते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। राम की शिवभक्ति के पीछे के कारणों की चर्चा के दौरान रामधारी सिंह दिनकर के संस्कृति के चार अध्याय की चर्चा करना प्रासंगिक होगा।

पहले शैव और वैष्णव संप्रदाय के लोग एक-दूसरे को फूटी आख भी नहीं देखना चाहते थे। वाल्मीकि रामायण में भी भगवान शिव और विष्णु के बीच हुए युद्ध की चर्चा है। भगवान राम ने समाज में समरसता कायम करने के लिए शिवभक्ति की परंपरा शुरू की। रामचरितमानस में भी तुलसीदास ने भगवान राम से कहलवाया है-शिव द्रोही मम शत्रु कहावा।
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सावन सोमवार : हर हर भोले नम: शिवाय


सावन और शिव का भारतीय संस्कृति से गहरा मेल है। सावन के झूलों से लेकर सावन सोमवार की बेलपत्री तक..सब कुछ मानो भावनाओं को हरा-भरा कर देने वाला। सावन के आते ही शिव भक्तों में पूजा अर्चना के लिए नई उमंग का संचार हो गया है। चारों ओर गूंजने लगे हैं बोल बम.. के जयकारे और हरे व केसरिया रंग से धरती पट सी गई है। सावन सोमवार को शिवालयों में सुबह से शाम तक भक्तों का तांता लगा रहेगा। हर कोई भोले से वरदान मांगने पहुंच जाता है उनके द्वार। शास्त्रों और पुराणों का कहना है कि श्रावण मास भगवान शंकर को अत्यंत प्रिय है। इस माह में शिवार्चना के लिए प्रमुख सामग्री बेलपत्र और धतूरा सहज सुलभ हो जाता है। सच पूछा जाए तो भगवान शिव ही ऐसे देवता है, जिनकी पूजा-अर्चना के लिए सामग्री को लेकर किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती। अगर कोई सामग्री उपलब्ध न हो तो जल ही काफी है। भक्ति भाव के साथ जल अर्पित कीजिए और भगवान शिव प्रसन्न।
जल चढ़ाओ और जो चाहे मांग लो
शास्त्रों के अनुसार श्रावण मास भगवान शकर को विशेष प्रिय है। अत: इस मास में आशुतोष भगवान शकर की पूजा का विशेष महत्व है। सोमवार शकर का प्रिय दिन है। इसलिए श्रावण सोमवार का और भी विशेष महत्व है। भगवान शकर का यह व्रत सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इस मास में लघुरुद्र, महारुद्र अथवा अतिरुद्र पाठ करके प्रत्येक सोमवार को शिवजी का व्रत किया जाता है। प्रात: काल गगा या किसी पवित्र नदी सरोवर या घर पर ही विधि पूर्वक स्नान करने का विधान है। इसके बाद शिव मदिर जाकर या घर में पार्थिव मूर्ति बना कर यथा विधि से रुद्राभिषेक करना अत्यत ही फलदायी है। इस व्रत में श्रावण महात्म्य और विष्णु पुराण कथा सुनने का विशेष महत्व है।

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शनिवार, 30 जून 2012

इस उपाय से श्री हनुमान पूजा करेगी मुसीबतों का सूपड़ा साफ


मन, शरीर और विचारों के जरिए जीवन और काम के प्रति सत्य व समर्पण की भावना मजबूत करने के लिये शनिवार या मंगलवार को श्री हनुमान पूजा बहुत शुभ फल देने वाली मानी गई है।

अगर आप भी सफलता और सुख की हर चाहत को पूरा करना चाहते हैं, तो हर कलह व मुसीबतों को दूर करने के लिए यहां बताया जा रहा श्री हनुमान उपासना का यह सरल उपाय विशेष मंत्र बोलते हुए करें |
 श्री हनुमान की पूजा में कुंकुम, अक्षत, फूल, नारियल, लाल वस्त्र और लाल लंगोट के साथ ही खासतौर पर सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाने का महत्व है। इस खास उपाय को करने के लिए अगली तस्वीर के साथ बताया जा रहा तरीका अपनाएं |

श्री हनुमान सिंदूर की चोला चढ़ी प्रतिमा को पवित्र जल से स्नान कराएं। इसके बाद थोड़े से चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर या सीधे प्रतिमा पर हल्का सा तेल लगाकर यह मंत्र विशेष बोलते हुए सिंदूर का चोला चढ़ा दें- सिन्दूरं रक्तवर्णं च सिन्दूरतिलकप्रिये। भक्तयां दत्तं मया देव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम।। - इसके बाद सभी पूजा सामग्री चढ़ाकर श्री हनुमान चालीसा पाठ करें या सुनें। गुग्गल धूप व तेल के दीप से श्री हनुमान की आरती करें व दु:खों की मार से रक्षा की प्रार्थना करें। अगली तस्वीर के साथ जानिए ऐसी हनुमान उपासना के क्या शुभ प्रभाव होते हैं  |

श्री हनुमान की ऐसी उपासना हर रोज़ भी करें तो मन में पैदा ईश्वर व खुद के प्रति विश्वास व्यावहारिक रूप से सोच व सेहत को भी बेहतर बनाने वाला साबित होता है। इनके जरिए ही मनचाही सफलता व यश पाने की चाहत पूरी करना आसान हो जाता है।

शनिवार, 5 मई 2012

5 मई की रात से 3 ग्रह एक साथ बनाएंगे तिकड़ी


आज 5 मई की रात 11 बजे बाद बुध ग्रह मेष राशि में जा रहा है। ये अभी तक नीच का था। मेष राशि में अभी गुरु एवं सूर्य पहले से स्थित हैं। अब बुध, गुरु और सूर्य तीनों ग्रहों की तिकड़ी बनेगी। 5 मई के बाद 21 मई 2012 की रात 9 बजकर 25 मिनट पर बुध वृषभ राशि में प्रवेश करेगा।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित मनीष शर्मा के अनुसार सूर्य, बुध और गुरु  एक साथ मेष राशि में रहेंगे। मेष राशि,मंगल के स्वामित्व वाली राशि है तथा इन तीनों ग्रहों से ही मंगल मित्र भाव रखता है। इन ग्रहों और इस भाव पर उच्च के शनि की दृष्टी भी बनी रहेगी शनि का भी बुध से सम भाव होने के कारण किसी प्रकार के प्राकृतिक आपदाओं से जनहानी की संभावनाएं कम हो जाएगी। आंतकवादियों की योजनाएं असफल होंगी। बुद्धि के क्षेत्र में कार्य करने वालों को विशेष सफलताएं मिलेगी। इस काल में रिलिज होने वाली फिल्में भी सफल होंगी तथा व्यापार में भी भारत को सफलताएं मिलेंगी।

पं. शर्मा ने बताया कि इस काल में जन्म लेने वाले बच्चे स्फूर्तीवान, धार्मिक एवं बुद्धिमान होंगे। ये बच्चे कई प्रकार के कार्य करने में होशियार रहेंगे तथा सभी के प्रिय होंगे।

साभार - दैनिक भास्कर

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

जाने सफलता और असफलता का रहस्य |

क्या आपकी कोई समस्या, परेशानी, दिक्कत आपको सता रही है? या आप कोई कार्य करना चाहते हैं और उसमें सफलता को लेकर संशय है, या कोई एग्जाम देना है, और आप सोच रहे हैं उसमें सफलता मिलेगी या नहीं, ऐसे हर सवाल के लिए यहां एक यंत्र दिया जा रहा है, जिसकी मदद से आपको अपने कार्य की सफलता-असफलता की ओर इशारा मिलेगा-
प्रश्न करने की विधि- अपनी समस्या या प्रश्न सोचकर अपने आराध्य देव का नाम लेकर आंख बंद करें और अपने कम्प्यूटर के माउस कर्शर के पॉइन्ट को यंत्र के ऊपर घुमाएं और कुछ देर बार माउस रोककर देखें कि कर्शर किस अंक पर है, उसी अंक का उत्तर आपके प्रश्न का उत्तर होगा।


१ . प्रश्न उत्तम है, कार्य पूर्ण होने की पूरी संभावना है।
२ . आराध्य देव की पूजा करके कार्य शुरू करें, सफलता निश्चित मिलेगी।
३. इस कार्य का परिणाम गड़बड़ हो सकता है।
४ . आपने कार्य के लिए जो रास्ता चुना है, उसे बदलकर नए तरीके से कार्य करें, सफलता अवश्य मिलेगी।
५ . कार्य में सफलता संभावित है। कार्य भगवान पर छोड़ दें।
६ . और अधिक प्रयत्न करने की जरूरत है, सफलता निश्चित ही मिलेगी।
७. कार्य में कई परेशानियां आएंगी परंतु कार्य पूर्ण हो जाएगा।
८. कार्य कठिनाइयों से भरा है, सफलता की उम्मीद कम है।
९. इस कार्य में शत-प्रतिशत सफलता मिलेगी।

शनिवार, 17 मार्च 2012

एकादशी

हिन्दू धर्म (पंचांग) के हिसाब  से हर महीने में २ एकादशी होती हैं। पूर्णिमा और अमावस्या के दस दिन बाद ग्यारहवीं दिन की तिथि एकादशी कहलाती है। पुण्य संचय करने में एकादशी  व्रत का बहुत ज्यादा महात्तम है। सभी एकादशी का अपना अलग-अलग महत्त्व है। 
                                           
                                       एकादशी वर्त (२०१२)

४ -५  जनवरी २०१२ - पुत्रदा/वैकुण्ठी एकादशी  
१९  जनवरी २०१२ -  षटतिला एकादशी  
३  फरवरी २०१२ - जया एकादशी 
१७ -१८  फरवरी २०१२ -  विजया एकादशी
४  मार्च २०१२ - आमलकी एकादशी 
१८  मार्च २०१२ - पापमोचनी एकादशी  
३  अप्रेल २०१२  - कामदा एकादशी
 १६ -१७  अप्रेल २०१२ - वरुथिनी एकादशी 
 २ मई २०१२ - मोहिनी एकादशी 
 १६  मई २०१२ - अपरा एकादशी 
  १  जून २०१२ - निर्जला एकादशी 
  १५  जून २०१२ - योगिनी एकादशी 
   ३०  जून २०१२ - देवशयनी एकादशी 
   १४  जुलाई २०१२ -  कामिका एकादशी
    २१  जुलाई २०१२ - पुत्रदा/पवित्रा एकादशी 
    १३  अगस्त २०१२ - अजा एकादशी
    २७  अगस्‍त २०१२  - पद्मिनी एकादशी
    १२ सितंबर २०१२  - परमा एकादशी
    २६  सितंबर २०१२ - पदमा एकादशी 
    ११  अक्‍टूबर २०१२ -  इन्दिरा एकादशी 
     २५ अक्टूबर २०१२  - पापांकुशा एकादशी
     १०  नवंबर २०१२ - रमा एकादशी 
     २४  नवंबर २०१२ - प्रबोधिनी / देव उठनी एकादशी
    ९ -१०  दिसंबर २०१२ - उत्पत्ति एकादशी
      २३ -२४  दिसंबर २०१२ - मोक्षदा एकादशी