सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

चंद्रघंटा देवी


पिंडज प्रवरारूढ़ा चंडकोपास्त्रकैर्युता। 
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघंटेति विश्रुता।।

मां दुर्गा तेसर रूपक नाम चंद्रघंटा अछि। दुर्गा पूजा मे तीसरे दिन हिनके विग्रहक पूजन और आराधना होयत अछि। हिनकर  स्वरूप परम शांतिदायक आओर कल्याणकारी अछि। हिनका माथ पर घंटा के आकारक अर्धचंद्र अछि। अहि द्वारे अहि देवी के नाम चंद्रघंटा पड़लैन। हिनका शरीरक रंग स्वर्ण के समान चमकैत अछि। हिनकर वाहन सिंह अछि। मन, वचन, कर्म एवं शरीर सँ शुद्ध भs के विधि-विधान के अनुसार मां चंद्रघंटा के शरण लके हिनकर उपासना आ आराधना मे तत्पर होवाक  चाहि। हिनकर उपासना सँ समस्त सांसारिक कष्ट सँ मुक्ति भेटैत अछि।

चंद्रघंटा देवी भक्तों के जन्म-जन्मांतर के कष्ट सँ मुक्त कय इहलोक आओर परलोक मे कल्याण प्रदान करैत छथि। हिनका दस हाथ मे कमल, धनुष, बाण, कमंडल, तलवार, त्रिशूल आओर गदा समान अस्त्र छैन। हिनका कंठ में श्वेत पुष्प के माला आओर रत्‍‌न जडि़त मुकुट शीर्ष पर विराजमान छैन। अपन दुनु हाथ सँ ई साधक के चिरायु, आरोग्य आओर सुख-संपदा के  वरदान दैत छथिन। चंद्रघंटा के पूजा-अर्चना देवी के मंडपों मे बड़ उत्साह आओर उमंग सँ  कायल जाईत अछि। हिनकर स्वरूप के उत्पन्न भेला पर राक्षश सब के अंत भेनाई शुरू भ गेल छलैक। मंडप मे सजल घंटा आओर घडि़याल बजाके चंद्रघंटा की पूजा उस समय की जाती है, जब आकाश में एक लकीरनुमा चंदमा सायंकाल के समय उदित हो रहा हो। चंद्रघंटा के पूजा-अर्चना केला सँ सिर्फ बल आओर बुद्धिये टा के विकास होयत अछि, बल्कि युक्ति, शक्ति आओर प्रकृति सेहो साधक के संग दैत अछि।

शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

ब्रह्मचारिणी



  
ध्यान मंत्र
दधानां कर पद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलम् ।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्त मा॥

आजुक दिन (द्वितीया) तिथि, ६ अक्टूबर २०१३, दिन रविवार माता ब्रह्मचारिणी के पूजा होयत अछि । माता ब्रह्मचारिणी भगवान शंकर के पति रूप मे प्राप्त करवाक लेल घोर तपस्या केने छलैथ ।  घोर तपस्या के कारण देवी के तपश्चारिणी यानी ब्रह्मचारिणी नाम सँ पुकारल जायत अछि । मां दुर्गा की नवशक्ति के दोसर रूप ब्रह्मचारिणी के छैन। ई ब्रह्म का अर्थ तपस्या सँ  अछि। मां दुर्गाक ई रूप भक्त आओर सिद्ध प्राप्त करय वाला के अनंत फल भेटैत अछि। हिनकर उपासना सँ तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार आओर संयम के वृद्धि होयत अछि। ब्रह्मचारिणीक अर्थ तप के चारिणी यानी तप के आचरण करय वाली। देवी के इ रूप पूर्ण ज्योतिर्मय आओर अत्यंत भव्य अछि। अहि देवी के दहिना हाथ मे जप के माला आओर बामा हाथ मे कमण्डल धारण केने छैथ। पूर्व जन्म मे माता ब्रह्मचारिणी हिमालय के घर बेटी रूप में जन्म लेने छलैथ आओर नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर के पतिक रूप मे प्राप्त करवाक लेल घोर तपस्या केने छलैथ। हजार वर्ष तक केवल फल-फूल खा के  आओर सौ वर्ष केवल जमीन पर पत्ता पर जीवन निर्वाह केलैथ। आगुओ कतेक हजार वर्ष तक निर्जल और निराहार रहि के  तपस्या करैत रहलि। कठिन तपस्या के कारण देवीक शरीर एकदम क्षीण भs गेलैन। देवता, ऋषि-मुनि सब ब्रह्मचारिणीक  तपस्या के अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बतेलैथ आओर सराहना केलैथ। माता ब्रह्मचारिणी देवीक कृपा सँ  सब  तरहक  मनोकामना पुरा होयत अछि। दुर्गा पूजा के दोसर दिन देवी के अहि स्वरूप के उपासना कायल जायत अछि। अहि देवीक कथाक सार ई अछि जे जीवनक कठिन संघर्षों मे मन विचलित नहि  करवाक चाही ।

ध्यान

वन्दे वांच छि लाभायचन्द्रर्घकृतशेखराम्।
जपमालाकमण्डलुधराब्रह्मचारिणी शुभाम्घ्
गौरवर्णास्वाधिष्ठानास्थितांद्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
धवल परिधानांब्रह्मरूपांपुष्पालंकारभूषिताम्घ्
पद्मवंदनापल्लवाराधराकातंकपोलांपीन पयोधराम्।
कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीनिम्न नाभि नितम्बनीम्घ्


स्तोत्र

तपश्चारिणीत्वंहितापत्रयनिवारिणीम्।
ब्रह्मरूपधराब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्घ्
नवचक्त्रभेदनी त्वंहिनवऐश्वर्यप्रदायनीम्।
धनदासुखदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्घ्
शंकरप्रियात्वंहिभुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदामानदा,ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्। कवच
त्रिपुरा में हृदयेपातुललाटेपातुशंकरभामिनी।
अर्पणासदापातुनेत्रोअर्धरोचकपोलोघ्
पंचदशीकण्ठेपातुमध्यदेशेपातुमहेश्वरीघ्
षोडशीसदापातुनाभोगृहोचपादयो।

शैलपुत्रीक पूजाक विधान (कलश स्थापना)




दुर्गा-पूजाक पहिल दिन मां शैलपुत्रीक पूजाक विधान अछि । दुर्गा-पूजा प्रारम्भ आश्रि्वन शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा तिथि के  कलश स्थापना के संग होयत अछि ।  कलश के हिन्दु विधान में मंगलमूर्ति गणेशक स्वरूप मानल जायत अछि, अत: सबसे पहिने कलशक स्थापना कायल जायत अछि ।

कलश स्थापना के लेल भूमि के सिक्त यानी शुद्ध कायल जायत अछि । गाय गोबर और गंगा-जल सँ भूमि को निपल जायत अछि । विधि- विधान के अनुसार अहि स्थान पर अक्षत राखल जायत अछि और सिनुर पिठार कलश में लगायल जायत अछि । ओकरा बाद कलश स्थापित कायल जायत अछि ।

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्रीक पूजा कायल जायत अछि । मार्कण्डेय पुराण के अनुसार देवीक ई नाम हिमालय में  जन्म भेलाक कारण परल छैन । हिमालय हमर शक्ति, दृढ़ता, आधार व स्थिरताक प्रतीक अछि ।

मां शैलपुत्री के अखंड सौभाग्य के प्रतीक सेहो मानल   जायत छैन । नवरात्रि के पहिल दिन योगीजन अपनी शक्ति मूलाधार में स्थित करैत छथि आ योग साधना करैत छथि।

ध्यान मंत्र

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रा‌र्द्वकृतशेखराम्।
वृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम्॥

अर्थात- देवी वृषभ पर विराजित छथि । शैलपुत्री के दाहिना हाथ में त्रिशूल छैन आ बामा हाथ में कमल पुष्प सुशोभित छैन । ईहाँ नवदुर्गा में प्रथम दुर्गा छैथ । नवरात्रि के पहिल दिन देवी उपासना में शैलपुत्रीक पूजन करवाक चाहि।

महत्व
हमरा जीवन प्रबंधन में दृढ़ता, स्थिरता आ आधारक महत्व सर्वप्रथम अछि । अत: नवरात्रि के पहले दिन हमरा सबके अपन स्थायित्व आ शक्तिमान हेवाक लेल माता शैलपुत्री से प्रार्थना करवाक चाहि। शैलपुत्री का आराधना केला सँ जीवन में स्थिरता आबैत अछि । हिमालयक बेटी हेवाक कारण ई देवी प्रकृति स्वरूपा सेहो छैथ । स्त्रिगन के लेल हिनके पूजा श्रेष्ठ और मंगलकारी अछि ।

बुधवार, 26 जून 2013

बृहस्पतिवार व्रतकथा


प्राचीन समय की बात है. किसी राज्य में एक बड़ा प्रतापी तथा दानी राजा राज्य करता था | वह प्रत्येक गुरूवार को व्रत रखता एवं भूखे और गरीबों को दान देकर पुण्य प्राप्त करता था परन्तु यह बात उसकी रानी को अच्छा नहीं लगता था | वह न तो व्रत करती थी और न ही किसी को एक भी पैसा दान में देती थी और राजा को भी ऐसा करने से मना करती थी |
एक समय की बात है, राजा शिकार खेलने को वन को चले गए थे. घर पर रानी और दासी थी | उसी समय गुरु वृहस्पतिदेव साधु का रूप धारण कर राजा के दरवाजे पर भिक्षा मांगने को आए | साधु ने जब रानी से भिक्षा मांगी तो वह कहने लगी, हे साधु महाराज, मैं इस दान और पुण्य से तंग आ गई हूं. आप कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे कि सारा धन नष्ट हो जाए और मैं आराम से रह सकूं |
वृहस्पतिदेव ने कहा, हे देवी, तुम बड़ी विचित्र हो, संतान और धन से कोई दुखी होता है | अगर अधिक धन है तो इसे शुभ कार्यों में लगाओ, कुवांरी कन्याओं का विवाह कराओ, विद्यालय और बाग़-बगीचे का निर्माण कराओ, जिससे तुम्हारे दोनों लोक सुधरें, परन्तु साधु की इन बातों से रानी को ख़ुशी नहीं हुई. उसने कहा- मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं है, जिसे मैं दान दूं और जिसे संभालने में मेरा सारा समय नष्ट हो जाए |
तब साधु ने कहा- यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो मैं जैसा तुम्हें बताता हूं तुम वैसा ही करना | वृहस्पतिवार के दिन तुम घर को गोबर से लीपना, अपने केशों को पीली मिटटी से धोना, केशों को धोते समय स्नान करना, राजा से हजामत बनाने को कहना, भोजन में मांस मदिरा खाना, कपड़ा धोबी के यहां धुलने डालना | इस प्रकार सात वृहस्पतिवार करने से तुम्हारा समस्त धन नष्ट हो जाएगा. इतना कहकर साधु रुपी वृहस्पतिदेव अंतर्ध्यान हो गए |
साधु के कहे अनुसार करते हुए रानी को केवल तीन वृहस्पतिवार ही बीते थे कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई | भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा. तब एक दिन राजा रानी से बोला- हे रानी, तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूं, क्योंकि यहां पर सभी लोग मुझे जानते हैं | इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता | ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया. वहां वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता | इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा | इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुखी रहने लगी |
एक बार जब रानी और दासी को सात दिन तक बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा- हे दासी, पास ही के नगर में मेरी बहन रहती है | वह बड़ी धनवान है | तू उसके पास जा और कुछ ले आ ताकि थोड़ा-बहुत गुजर-बसर हो जाए| दासी रानी के बहन के पास गई | उस दिन वृहस्पतिवार था और रानी की बहन उस समय वृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी | दासी ने रानी की बहन को अपनी रानी का सन्देश दिया, लेकिन रानी की बड़ी बहन ने कोई उत्तर नहीं दिया | जब दासी को रानी की बहन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुखी हुई और उसे क्रोध भी आया | दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी | सुनकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा. उधर, रानी की बहन ने सोचा कि मेरी बहन की दासी आई थी, परन्तु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुखी हुई होगी. कथा सुनकर और पूजन समाप्त कर वह अपनी बहन के घर आई और कहने लगी- हे बहन, मैं वृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी | तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परन्तु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली. कहो दासी क्यों गई थी |
रानी बोली- बहन, तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था | ऐसा कहते-कहते रानी की आंखे भर आई | उसने दासी समेत पिछले सात दिनों से भूखे रहने तक की बात अपनी बहन को विस्तारपूर्वक सूना दी | रानी की बहन बोली- देखो बहन, भगवान वृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं. देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो. पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अन्दर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया | यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई. दासी रानी से कहने लगी- हे रानी, जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सके. तब रानी ने अपनी बहन से वृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा. उसकी बहन ने बताया, वृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें | इससे वृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं | व्रत और पूजन विधि बतलाकर रानी की बहन अपने घर को लौट गई |
सातवें रोज बाद जब गुरूवार आया तो रानी और दासी ने निश्चयनुसार व्रत रखा | घुड़साल में जाकर चना और गुड़ बीन लाई और फिर उसकी दाल से केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया | अब पीला भोजन कहां से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुखी थे. चूंकि उन्होंने व्रत रखा था इसलिए गुरुदेव उनपर प्रसन्न थे | इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए | भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया |
उसके बाद वे सभी गुरूवार को व्रत और पूजन करने लगी | वृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति हो गया, परन्तु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी | तब दासी बोली- देखो रानी, तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान गुरुदेव की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है | बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए, और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना चाहिए, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़ेगा, स्वर्ग की प्राप्ति हो और पित्तर प्रसन्न हो. दासी की बात मानकर रानी अपना धन शुभ कार्यों में खर्च करने लगी, जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा |


                 आरती:

ॐ जय ब्रह्स्पति देवा, जय ब्रह्स्पति देवा |
छिन छिन भोग लगाऊ फल मेवा ||

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी |
जगत पिता जगदीश्वर तुम सबके स्वामी || ॐ

चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता |
सकल मनोरथ दायक, किरपा करो भर्ता || ॐ

तन, मन, धन अर्पणकर जो शरण पड़े |
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े || ॐ

दीन दयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी |
पाप दोष सभ हर्ता,भाव बंधन हारी || ॐ

सकल मनोरथ दायक,सब संशय तारो |
विषय विकार मिटाओ संतन सुखकारी || ॐ

जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे |
जेष्टानंद बन्द सो सो निश्चय पावे || ॐ

सोमवार, 9 जुलाई 2012

क्यों रखना चाहिए सावन सोमवार के व्रत?


हिन्दू धर्म में सोमवार के दिन व्रत रखने का महत्व बताया गया है। यह शिव उपासना से कामनासिद्धि के लिए प्रसिद्ध है। खासतौर पर शिव भक्ति के विशेष काल सावन माह के सोमवार साल भर के सोमवार व्रतों का पुण्य देने वाले माने गए हैं।  किंतु सोमवार व्रत रखने की एक ओर खास वजह भी है, जानिए -

ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक यह दिन कुण्डली में चंद्र ग्रह के बुरे योग से जीवन में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए भी अहम है। दरअसल, चंद्र मानव जीवन और प्रकृति पर असर डालता है और चंद्र के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए ही सोमवार को चंद्र पूजा और व्रत का महत्व बताया गया है। डालिए चंद्रमा के होने वाले प्रभावों पर एक नजर -

विज्ञान के मुताबिक पृथ्वी समेत अन्य सभी ग्रह सूर्य के चक्कर लगाते हैं। वहीं चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है, क्योंकि वह ग्रह न होकर एक उपग्रह है। व्यावहारिक जीवन में भी हम देखते हैं कि चन्द्रमा मानव जीवन के साथ-साथ साथ-साथ पूरे जगत पर ही प्रभाव डालता है।  इसका प्रमाण है पूर्णिमा की रात जब चन्द्रमा पूर्ण आकार में दिखाई देता है, तब समुद्र में आता है ज्वार। वहीं जब अमावस्या के आस-पास चन्द्रमा अदृश्य होता है, तब समुद्र पूरी तरह शांत रहता है। इस प्रकार आकाश में चन्द्रमा के आकार घटने-बढऩे के साथ-साथ पानी और अन्य तरल पदार्थों में हलचल भी कम-ज्यादा होने लगती है।

ज्योतिष विज्ञान कहता है कि चन्द्रमा हमारी पृथ्वी के सबसे नजदीक है और अपनी निकटता के कारण ही हमारे जीवन के हर कार्य व्यवहार पर सबसे अधिक असर डालता है। यही वजह है कि जिन लोगों में जल तत्व की प्रधानता होती है, वे पूर्णिमा के आस-पास अधिक आक्रामक, क्रोधित और उद्दण्ड बने रहते हैं। जबकि अमावस्या के आस-पास एकदम शांत और गंभीर देखे जाते हैं।

खासतौर पर जलतत्व राशि जैसे मीन, कर्क, वृश्चिक वाले स्त्री-पुरुषों को सोमवार का व्रत और चन्द्रदेव का पूजन तो जरूर करना ही चाहिए। मानसिक शांति, मन की चंचलता को रोकने और दिमाग को संतुलित रखने के लिए तो चन्द्रदेव के निमित्त किए जाने वाला सोमवार का व्रत ही श्रेष्ठ उपाय है। चंद्रदोष शांत के लिए स्फटिक की माला पहनना तथा मोती का धारण करना शुभ होता है।

धार्मिक दृष्टि से चूंकि शास्त्रों में भगवान शिव चन्द्रमौलेश्वर यानी दूज के चांद को मस्तक पर धारण करने वाले बताए गए हैं। शिव कृपा से ही चंद्रदेव ने फिर से सौंदर्य को पाया। इसलिए सोमवार को व्रत रख शिव पूजा से चंद्र पूजा होने के साथ चंद्र दोष और रोग भी दूर हो जाते हैं। 



निराली है शिव की महिमा

मान्यता है कि भगवान शिव संसार के समस्त मंगल का मूल हैं। यजुर्वेद में उनकी स्तुति इस प्रकार की गई है- नम: शंभवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नम: शिवाय च शिवतराय च॥ इस वैदिक ऋचा में परमात्मा को 'शिव', 'शंभु' और 'शंकर' नाम से नमन किया गया है। 'शिव' शब्द बहुत छोटा है, पर इसके अर्थ इसे गंभीर बना देते है। 'शिव' का व्यावहारिक अर्थ है 'कल्याणकारी'। 'शंभु' का भावार्थ है 'मंगलदायक'। 'शंकर' का तात्पर्य है 'आनंद का श्चोत'। यद्यपि ये तीनों नाम भले ही भिन्न हों, लेकिन तीनों का संकेत कल्याणकारी, मंगलदायक, आनंदघन परमात्मा की ओर ही है। वे देवाधिदेव महादेव, सबके अधिपति महेश्वर सदाशिव ही है। परंतु यह ध्यान रहे कि भगवान 'शिव' त्रिदेवों के अंतर्गत रुद्र [रौद्र रूप वाले] नहीं हैं।
भगवान शिव की इच्छा से प्रकट रजोगुण रूप धारण करने वाले ब्रहृमा, सलवगुणरूप विष्णु एवं तमोगुण रूप रुद्र है, जो क्रमश: सृजन, रक्षण [पालन] तथा संहार का कार्य करते है। ये तीनों वस्तुत: सदाशिव की ही अभिव्यक्ति है, इसलिए ये शिव से पृथक भी नहीं हैं। ब्रहृमा-विष्णु-महेश तात्विक दृष्टि से एक ही है। इनमें भेद-करना अनुचित है।
दार्शनिक मान्यता है कि ब्रहृमांड पंचतत्वों से बना है। ये पांच तत्व है- जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश। भगवान शिव पंचानन अर्थात पांच मुख वाले है। शिवपुराण में इनके इसी पंचानन स्वरूप का ध्यान बताया गया है। ये पांच मुख- ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात नाम से जाने जाते है। भगवान शिव के ऊ‌र्ध्वमुख का नाम 'ईशान' है, जिसका दुग्ध जैसा वर्ण है। 'ईशान' आकाश तत्व के अधिपति है। ईशान का अर्थ है सबके स्वामी। ईशान पंचमूर्ति महादेव की क्रीड़ामूर्ति हैं। पूर्वमुख का नाम 'तत्पुरुष' है, जिसका वर्ण पीत [पीला] है। तत्पुरुष वायु तत्व के अधिपति है। तत्पुरुष तपोमूर्ति हैं। भगवान सदाशिव के दक्षिणी मुख को 'अघोर' कहा जाता है। यह नीलवर्ण [नीले रंग का] है। अघोर अग्नितत्व के अधिपति है। अघोर शिवजी की संहारकारी शक्ति हैं, जो भक्तों के संकटों को दूर करती है। उत्तरी मुख का नाम वामदेव है, जो कृष्णवर्ण का है। वामदेव जल तत्व के अधिपति है। वामदेव विकारों का नाश करने वाले है, अतएव इनके आश्रय में जाने पर पंचविकार काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह नष्ट हो जाते है। भगवान शंकर के पश्चिमी मुख को 'सद्योजात' कहा जाता है, जो श्वेतवर्ण का है। सद्योजात पृथ्वी तत्व के अधिपति है और बालक के समान परम स्वच्छ, शुद्ध और निर्विकार है। सद्योजात ज्ञानमूर्ति बनकर अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करके विशुद्ध ज्ञान को प्रकाशित कर देते है। पंचभूतों [पंचतत्वों] के अधिपति होने के कारण ये 'भूतनाथ' कहलाते है।
शिव-जगत में पांच का और भी महत्व है। रुद्राक्ष सामान्यत: पांच मुख वाला ही होता है। शिव-परिवार में भी पांच सदस्य है- शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदी। शिवजी की उपासना पंचाक्षर मंत्र- 'नम: शिवाय' द्वारा की जाती है। शिव काल (समय) के प्रवर्तक और नियंत्रक होने के कारण 'महाकाल' भी कहलाते है। काल की गणना 'पंचांग' द्वारा होती है। काल के पांच अंग- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण शिव के ही अवयव है।
शिव जी करुणासिंधु, भक्तवत्सल होने के कारण भक्त की भावना के वशीभूत होकर उसकी मनोकामना पूर्ण कर देते है, पर यह स्मरण रहे कि 'देवो भूत्वा यजेत् देवं।' अर्थात अपने इष्टदेव की अर्चना करने के लिए पहले अपने आपको उनके अनुरूप बनाओ। इसलिए 'शिवो भूत्वा शिवं यजेत्' को अपने आचरण में ढाल लें। शिवार्चन तभी सफल होगा, जब भक्त शिव के समान ही त्यागी, परोपकारी, संयमी, साधनाशील और सहिष्णु होगा। श्रुतियों में कहा गया है कि शिव ही समस्त प्राणियों के अंतिम विश्राम के स्थान है। वेदों, पुराणों और उपनिषदों में शिव को ही सच्चिदानंद घन परब्रहृम कहा गया है। यही कारण है कि निर्गुण निराकार शिवलिंग-रूप तथा सगुण-साकार मूर्तिरूप, दोनों तरह से शिव जी का पूजन होता है।

'वृष' का शाब्दिक अर्थ धर्म (जिसे हम धारण करते हैं अर्थात हमारे कर्तव्य) भी है। भगवान शंकर धर्म अर्थात कर्तव्यों के भी अधिपति है।? शिवजी की आराधना में कर्मकांड की जटिलता नहीं, वरन भावना की प्रधानता है। वे अतिशीघ्र प्रसन्न हो जाते है। इसी कारण वे 'आशुतोष' कहलाते है। जिस प्रकार हलाहल (विष) को पीकर उन्होंने देवताओं को संकट से बचाया और 'नीलकंठ' बन गए, उसी तरह उनके भक्तों को भी उनका अनुसरण करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
शिव-तत्व को जीवन में उतार लेना ही शिवत्व प्राप्त करना है और यही शिव होना है। हमारा लक्ष्य भी यही होना चाहिए। तभी शिवार्चन सफल होगा और सावन का पूरा लाभ मिलेगा।

क्या है शिव के गले के नाग का रहस्य?


भगवान शिव के विराट स्वरूप की महिमा बताते शिव पञ्चाक्षरी स्तोत्र की शुरुआत में शिव को 'नागेन्द्रहाराय' कहकर स्तुति की गई है, जिसका सरल शब्दों में अर्थ है, ऐसे देवता जिनके गले में सर्प का हार है। यह शब्द शिव के दिव्य और विलक्षण चरित्र को उजागर ही नहीं करता बल्कि जीवन से जुड़ा एक सूत्र भी सिखाता है।

शास्त्रों के मुताबिक शिव नागों के अधिपति है। दरअसल, नाग या सर्प कालरूप माना गया है। क्योंकि वह जहरीला व तामसी स्वभाव का जीव है। नागों का शिव के अधीन होना यही संकेत है कि शिव तमोगुण, दोष व विकारों के नियंत्रक व संहारक हैं, जो कलह का कारण ही नहीं बल्कि जीवन के लिए घातक भी होते हैं। इसलिए वह प्रतीक रूप में कालों के काल भी पुकारे जाते हैं और शिव भक्ति ऐसे ही दोषों को दूर करती है। इन बातों में जीवन से जुड़ा एक सबक है।

शिव का नागों का हार पहनना व्यावहारिक जीवन के लिए भी यही संदेश देता है कि अगर ज़िंदगी को तबाह करने वाले कलह और कड़वाहट रूपी घातक जहर से बचाना है तो मन, वचन व कर्म से द्वेष, क्रोध, काम, लोभ, मोह, मद जैसे विकारों व बुरी आदत रूपी नागों पर काबू रखें। सरल शब्दों में कहें तो साफ छवि और संयम भरी जीवनशैली से जीवन को शिव की तरह निर्भय, निश्चिंत व सुखी बनाएं।

source:dainikbhaskar

ऐसे करें शिव को प्रसन्न


श्रावण मास में आने वाले सोमवार के दिनों में भगवान शिवजी का व्रत करना चाहिए और व्रत करने के बाद भगवान श्री गणेश जी, भगवान शिवजी, माता पार्वती व नन्दी देव की पूजा करनी चाहिए। पूजन सामग्री में जल, दुध, दही, चीनी, घी, शहद, पंचामृ्त,मोली, वस्त्र, जनेऊ, चन्दन, रोली, चावल, फूल, बेल-पत्र, भा ंग, आक-धतूरा, कमल,गट्ठा, प्रसाद, पान-सुपारी, लौंग, इलायची, मेवा, दक्षिणा चढाया जाता है।
वर्ष 2012 में यह माह 3 जुलाई से प्रारम्भ होकर 2 अगस्त के मध्य अवधि में रहेगा। इस दिन धूप दीया जलाकर कपूर से आरती करनी चाहिए। व्रत के दिन पूजा करने के बाद एक बार भोजन करना चाहिए। और श्रावण मास में इस माह की विशेषता का श्रवण करना चाहिए।

श्रावण मास शिव उपासना महत्व:-

भगवान शिव को श्रावण मास सबसे अधिक प्रिय है। इस माह में प्रत्येक सोमवार के दिन भगवान श्री शिव की पूजा करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। इस मास में भक्त भगवान शकर का पूजन व अभिषेक करते है। सभी देवों में भगवान शकर के विषय में यह मान्यता प्रसिद्ध है, कि भगवान भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते है। एक छोटे से बिल्वपत्र को चढ़ाने मात्र से तीन जन्मों के पाप नष्ट होते है।
श्रावण मास के विषय में प्रसिद्ध एक पौराणिक मान्यता के अनुसार श्रावण मास के सोमवार व्रत, एक प्रदोष व्रत तथा और शिवरात्री का व्रत जो व्यक्ति करता है, उसकी कोई कामना अधूरी नहीं रहती है। 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के समान यह व्रत फल देता है।

इस व्रत का पालन कई उद्देश्यों से किया जा सकता है। महिलाएं श्रावण के 16 सोमवार के व्रत अपने वैवाहिक जीवन की लंबी आयु और संतान की सुख-समृ्दि्ध के लिये करती है, तो यह अविवाहित कन्याएं इस व्रत को पूर्ण श्रद्वा से कर मनोवाछित वर की प्राप्ति करती है। सावन के 16 सोमवार के व्रत कुल वृद्धि, लक्ष्मी प्राप्ति और सुख -सम्मान के लिये किया जाता है।


शिव पूजन में बेलपत्र प्रयोग करना:-

भगवान शिव की पूजा जब बेलपत्र से की जाती है, तो भगवान अपने भक्त की कामना बिना कहे ही पूरी करते है. बिल्व पत्र के बारे में यह मान्यता प्रसिद्ध है, कि बेल के पेड़ को जो भक्त पानी या गंगाजल से सींचता है, उसे समस्त तीथरें की प्राप्ति होती है। वह भक्त इस लोक में सुख भोगकर, शिवलोक में प्रस्थान करता है। बिल्व पत्थर की जड़ में भगवान शिव का वास माना गया है। यह पूजन व्यक्ति को सभी तीथरें में स्नान करने का फल देता है।

सावन माह व्रत विधि:-

सावन के व्रत करने से व्यक्ति को सभी तीथरें के दर्शन करने से अधिक पुन्य फल प्राप्त होते है। जिस व्यक्ति को यह व्रत करना हो, व्रत के दिन प्रात: काल में शीघ्र सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। श्रावण मास में केवल भगवान श्री शकर की ही पूजा नहीं की जाती है, बल्कि भगवान शिव की परिवार सहित पूजा करनी चाहिए। सावन सोमवार व्रत सूर्योदय से शुरु होकर सूर्यास्त तक किया जाता है। व्रत के दिन सोमवार व्रत कथा सुननी चाहिए। तथा व्रत करने वाले व्यक्ति को दिन में सूर्यास्त के बाद एक बार भोजन करना चाहिए।
प्रात:काल में उठने के बाद स्नान और नित्यक्त्रियाओं से निवृ्त होना चाहिए। इसके बाद सारे घर की सफाई कर, पूरे घर में गंगा जल या शुद्ध जल छिड़कर, घर को शुद्ध करना चाहिए। इसके बाद घर के ईशान कोण दिशा में भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करना चाहिए। मूर्ति स्थापना के बाद सावन मास व्रत संकल्प लेना चाहिए।
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चल पड़े कांवरिये


इस महीने में हरिद्वार की गंगा और कामना ज्योतिर्लिग के नाम से जाना जानेवाला सुप्रसिद्ध तीर्थस्थल देवघर की महिमा और भी बढ़ जाती है। शिव और शक्ति का सगम स्थल देवघर आदिकाल से ही पूजित है। वैसे तो सालभर तीर्थयात्री बाबा का जलाभिषेक करने देवघर पहुंचते है, लेकिन सावन की छटा कुछ अलग है। सावन में बाबा को जल चढ़ाने का अलग महत्व है। इसलिए एक महीने तक बाबाधाम में देश-विदेशों के कावरिये सुल्तानगज से कावर लिए बाबाधाम पहुचते है। इसके अलावा हरिद्वार में भी एक महीने तक कांवरिये का तांता लगा रहता है।

सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है। सत्य अर्थात भगवान विष्णु, शिव अर्थात मंगलकारी और दोनों का एक-दूसरे के प्रति समर्पित भाव ही सृष्टि की सुंदरता है। शिव के प्रति अपना समर्पण दिखाने के लिए भगवान राम ने ही कावर उठाने की परंपरा शुरू की थी। रावण की मौत के बाद शिव और राम में संघर्ष हुआ। दोनों तो बाद में मिल गए परंतु शिव के भूत-प्रेत और राम के रीछ-वानर आपस में झगड़ते रहे। इस झगड़े को शात कराने के लिए भगवान राम ने कई स्थानों पर शिव की पूजा की। सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भर कर कावर ले अपनी अद्र्धागिनी सीता, हनुमान और चारों भाइयों के साथ उन्होंने रावणेश्‌र्र्वर महादेव पर जल चढ़ाया। तब से श्रावण माह में सुल्तानगंज से जल भर कर देवघर जाने की परंपरा शुरू हो गई। ऐसा माना जाता है कि सर्वप्रथम कावर परंपरा की शुरुआत मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने ही की थी। रामायण काल से जुड़े स्थलों की खोज में लगी श्री रामायण रिसर्च कमेटी की टीम के अनुसार रावण के वध के उपरात भगवान श्रीराम ने लंका में शिवलिंग की स्थापना की थी जिसे आज मानवरी रामलिंगम के नाम से जाना जाता है।
श्रावण मास में शिव को गंगाजल चढ़ाने के पीछे भी एक रहस्य है। इसी मास में समुद्र मंथन से निकले हलाहल का भगवान शिव ने पान किया था। उसकी जलन को दूर करने के लिए सावन में भगवान शिव को गंगाजल चढ़ाने की परंपरा चल रही है, इसी कारण भगवान राम ने भी कावर ढोने की परंपरा की शुरुआत सावन में ही की थी। रावण हरिद्वार से गंगाजल लाकर भगवान शिव को अर्पित करता था, लेकिन सुल्तानगंज-देवघर कावरिया पथ को अमर बनाने के लिए भगवान राम का नाम लिया जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार जो नर-नारी कावर लेकर भगवान शिव को गंगाजल चढ़ाते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। राम की शिवभक्ति के पीछे के कारणों की चर्चा के दौरान रामधारी सिंह दिनकर के संस्कृति के चार अध्याय की चर्चा करना प्रासंगिक होगा।

पहले शैव और वैष्णव संप्रदाय के लोग एक-दूसरे को फूटी आख भी नहीं देखना चाहते थे। वाल्मीकि रामायण में भी भगवान शिव और विष्णु के बीच हुए युद्ध की चर्चा है। भगवान राम ने समाज में समरसता कायम करने के लिए शिवभक्ति की परंपरा शुरू की। रामचरितमानस में भी तुलसीदास ने भगवान राम से कहलवाया है-शिव द्रोही मम शत्रु कहावा।
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सावन सोमवार : हर हर भोले नम: शिवाय


सावन और शिव का भारतीय संस्कृति से गहरा मेल है। सावन के झूलों से लेकर सावन सोमवार की बेलपत्री तक..सब कुछ मानो भावनाओं को हरा-भरा कर देने वाला। सावन के आते ही शिव भक्तों में पूजा अर्चना के लिए नई उमंग का संचार हो गया है। चारों ओर गूंजने लगे हैं बोल बम.. के जयकारे और हरे व केसरिया रंग से धरती पट सी गई है। सावन सोमवार को शिवालयों में सुबह से शाम तक भक्तों का तांता लगा रहेगा। हर कोई भोले से वरदान मांगने पहुंच जाता है उनके द्वार। शास्त्रों और पुराणों का कहना है कि श्रावण मास भगवान शंकर को अत्यंत प्रिय है। इस माह में शिवार्चना के लिए प्रमुख सामग्री बेलपत्र और धतूरा सहज सुलभ हो जाता है। सच पूछा जाए तो भगवान शिव ही ऐसे देवता है, जिनकी पूजा-अर्चना के लिए सामग्री को लेकर किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती। अगर कोई सामग्री उपलब्ध न हो तो जल ही काफी है। भक्ति भाव के साथ जल अर्पित कीजिए और भगवान शिव प्रसन्न।
जल चढ़ाओ और जो चाहे मांग लो
शास्त्रों के अनुसार श्रावण मास भगवान शकर को विशेष प्रिय है। अत: इस मास में आशुतोष भगवान शकर की पूजा का विशेष महत्व है। सोमवार शकर का प्रिय दिन है। इसलिए श्रावण सोमवार का और भी विशेष महत्व है। भगवान शकर का यह व्रत सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इस मास में लघुरुद्र, महारुद्र अथवा अतिरुद्र पाठ करके प्रत्येक सोमवार को शिवजी का व्रत किया जाता है। प्रात: काल गगा या किसी पवित्र नदी सरोवर या घर पर ही विधि पूर्वक स्नान करने का विधान है। इसके बाद शिव मदिर जाकर या घर में पार्थिव मूर्ति बना कर यथा विधि से रुद्राभिषेक करना अत्यत ही फलदायी है। इस व्रत में श्रावण महात्म्य और विष्णु पुराण कथा सुनने का विशेष महत्व है।

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शनिवार, 30 जून 2012

इस उपाय से श्री हनुमान पूजा करेगी मुसीबतों का सूपड़ा साफ


मन, शरीर और विचारों के जरिए जीवन और काम के प्रति सत्य व समर्पण की भावना मजबूत करने के लिये शनिवार या मंगलवार को श्री हनुमान पूजा बहुत शुभ फल देने वाली मानी गई है।

अगर आप भी सफलता और सुख की हर चाहत को पूरा करना चाहते हैं, तो हर कलह व मुसीबतों को दूर करने के लिए यहां बताया जा रहा श्री हनुमान उपासना का यह सरल उपाय विशेष मंत्र बोलते हुए करें |
 श्री हनुमान की पूजा में कुंकुम, अक्षत, फूल, नारियल, लाल वस्त्र और लाल लंगोट के साथ ही खासतौर पर सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाने का महत्व है। इस खास उपाय को करने के लिए अगली तस्वीर के साथ बताया जा रहा तरीका अपनाएं |

श्री हनुमान सिंदूर की चोला चढ़ी प्रतिमा को पवित्र जल से स्नान कराएं। इसके बाद थोड़े से चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर या सीधे प्रतिमा पर हल्का सा तेल लगाकर यह मंत्र विशेष बोलते हुए सिंदूर का चोला चढ़ा दें- सिन्दूरं रक्तवर्णं च सिन्दूरतिलकप्रिये। भक्तयां दत्तं मया देव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम।। - इसके बाद सभी पूजा सामग्री चढ़ाकर श्री हनुमान चालीसा पाठ करें या सुनें। गुग्गल धूप व तेल के दीप से श्री हनुमान की आरती करें व दु:खों की मार से रक्षा की प्रार्थना करें। अगली तस्वीर के साथ जानिए ऐसी हनुमान उपासना के क्या शुभ प्रभाव होते हैं  |

श्री हनुमान की ऐसी उपासना हर रोज़ भी करें तो मन में पैदा ईश्वर व खुद के प्रति विश्वास व्यावहारिक रूप से सोच व सेहत को भी बेहतर बनाने वाला साबित होता है। इनके जरिए ही मनचाही सफलता व यश पाने की चाहत पूरी करना आसान हो जाता है।

शनिवार, 5 मई 2012

5 मई की रात से 3 ग्रह एक साथ बनाएंगे तिकड़ी


आज 5 मई की रात 11 बजे बाद बुध ग्रह मेष राशि में जा रहा है। ये अभी तक नीच का था। मेष राशि में अभी गुरु एवं सूर्य पहले से स्थित हैं। अब बुध, गुरु और सूर्य तीनों ग्रहों की तिकड़ी बनेगी। 5 मई के बाद 21 मई 2012 की रात 9 बजकर 25 मिनट पर बुध वृषभ राशि में प्रवेश करेगा।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित मनीष शर्मा के अनुसार सूर्य, बुध और गुरु  एक साथ मेष राशि में रहेंगे। मेष राशि,मंगल के स्वामित्व वाली राशि है तथा इन तीनों ग्रहों से ही मंगल मित्र भाव रखता है। इन ग्रहों और इस भाव पर उच्च के शनि की दृष्टी भी बनी रहेगी शनि का भी बुध से सम भाव होने के कारण किसी प्रकार के प्राकृतिक आपदाओं से जनहानी की संभावनाएं कम हो जाएगी। आंतकवादियों की योजनाएं असफल होंगी। बुद्धि के क्षेत्र में कार्य करने वालों को विशेष सफलताएं मिलेगी। इस काल में रिलिज होने वाली फिल्में भी सफल होंगी तथा व्यापार में भी भारत को सफलताएं मिलेंगी।

पं. शर्मा ने बताया कि इस काल में जन्म लेने वाले बच्चे स्फूर्तीवान, धार्मिक एवं बुद्धिमान होंगे। ये बच्चे कई प्रकार के कार्य करने में होशियार रहेंगे तथा सभी के प्रिय होंगे।

साभार - दैनिक भास्कर

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

जाने सफलता और असफलता का रहस्य |

क्या आपकी कोई समस्या, परेशानी, दिक्कत आपको सता रही है? या आप कोई कार्य करना चाहते हैं और उसमें सफलता को लेकर संशय है, या कोई एग्जाम देना है, और आप सोच रहे हैं उसमें सफलता मिलेगी या नहीं, ऐसे हर सवाल के लिए यहां एक यंत्र दिया जा रहा है, जिसकी मदद से आपको अपने कार्य की सफलता-असफलता की ओर इशारा मिलेगा-
प्रश्न करने की विधि- अपनी समस्या या प्रश्न सोचकर अपने आराध्य देव का नाम लेकर आंख बंद करें और अपने कम्प्यूटर के माउस कर्शर के पॉइन्ट को यंत्र के ऊपर घुमाएं और कुछ देर बार माउस रोककर देखें कि कर्शर किस अंक पर है, उसी अंक का उत्तर आपके प्रश्न का उत्तर होगा।


१ . प्रश्न उत्तम है, कार्य पूर्ण होने की पूरी संभावना है।
२ . आराध्य देव की पूजा करके कार्य शुरू करें, सफलता निश्चित मिलेगी।
३. इस कार्य का परिणाम गड़बड़ हो सकता है।
४ . आपने कार्य के लिए जो रास्ता चुना है, उसे बदलकर नए तरीके से कार्य करें, सफलता अवश्य मिलेगी।
५ . कार्य में सफलता संभावित है। कार्य भगवान पर छोड़ दें।
६ . और अधिक प्रयत्न करने की जरूरत है, सफलता निश्चित ही मिलेगी।
७. कार्य में कई परेशानियां आएंगी परंतु कार्य पूर्ण हो जाएगा।
८. कार्य कठिनाइयों से भरा है, सफलता की उम्मीद कम है।
९. इस कार्य में शत-प्रतिशत सफलता मिलेगी।

शनिवार, 17 मार्च 2012

एकादशी

हिन्दू धर्म (पंचांग) के हिसाब  से हर महीने में २ एकादशी होती हैं। पूर्णिमा और अमावस्या के दस दिन बाद ग्यारहवीं दिन की तिथि एकादशी कहलाती है। पुण्य संचय करने में एकादशी  व्रत का बहुत ज्यादा महात्तम है। सभी एकादशी का अपना अलग-अलग महत्त्व है। 
                                           
                                       एकादशी वर्त (२०१२)

४ -५  जनवरी २०१२ - पुत्रदा/वैकुण्ठी एकादशी  
१९  जनवरी २०१२ -  षटतिला एकादशी  
३  फरवरी २०१२ - जया एकादशी 
१७ -१८  फरवरी २०१२ -  विजया एकादशी
४  मार्च २०१२ - आमलकी एकादशी 
१८  मार्च २०१२ - पापमोचनी एकादशी  
३  अप्रेल २०१२  - कामदा एकादशी
 १६ -१७  अप्रेल २०१२ - वरुथिनी एकादशी 
 २ मई २०१२ - मोहिनी एकादशी 
 १६  मई २०१२ - अपरा एकादशी 
  १  जून २०१२ - निर्जला एकादशी 
  १५  जून २०१२ - योगिनी एकादशी 
   ३०  जून २०१२ - देवशयनी एकादशी 
   १४  जुलाई २०१२ -  कामिका एकादशी
    २१  जुलाई २०१२ - पुत्रदा/पवित्रा एकादशी 
    १३  अगस्त २०१२ - अजा एकादशी
    २७  अगस्‍त २०१२  - पद्मिनी एकादशी
    १२ सितंबर २०१२  - परमा एकादशी
    २६  सितंबर २०१२ - पदमा एकादशी 
    ११  अक्‍टूबर २०१२ -  इन्दिरा एकादशी 
     २५ अक्टूबर २०१२  - पापांकुशा एकादशी
     १०  नवंबर २०१२ - रमा एकादशी 
     २४  नवंबर २०१२ - प्रबोधिनी / देव उठनी एकादशी
    ९ -१०  दिसंबर २०१२ - उत्पत्ति एकादशी
      २३ -२४  दिसंबर २०१२ - मोक्षदा एकादशी 

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

कार्तिक पूर्णिमा के दिन शिव त्रिपुरारि बने

भारतीय संस्कृति में कार्तिक मास की पूर्णिमा का धार्मिक एवं आध्यात्मिक माहात्म्य है। दीपावली, यम द्वितीया और गोवर्धनपूजा के अलावा इस मास के सांस्कृतिक पर्वो में यह पर्व असीम आस्था का संचार करता है। वर्ष के बारह महीनों में यह कार्तिक मास धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से विशेष महत्व का है। इसे त्रिपुरीपूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान तथा दीपदान की प्राचीन परम्परा है। अयोध्या में सरयू में स्नान करने के लिए जन-समुद्र उमड पडता है। सूर्यास्त काल में सरयू तट पर दीप पंक्तियां मनोहारी लगती है। गंगातटपर अनगिनत नर नारी श्रद्धाभिभूतहोकर अवगाहन लगाते हैं। हरिद्वार, काशी, प्रयाग, राजघाट, गढमुक्तेश्वर,विदुरकुटीकानपुर, अनूप शहर में गंगा में स्नान कर अपार जनमानस आह्लादितहोता है।

कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन कृतिका नक्षत्र रहने पर महाकार्तिकीपूर्णिमा का अटूट विश्वास है। भरणी नक्षत्र में पडने पर विशेष फलदायक एवं रोहिणी नक्षत्र के रहने पर इस महापर्वका फल और संविर्द्धतहो जाता है। इस दिन कृत्तिका चन्द्रमा और विशाखाका सूर्य होने पर पदमकयोग रहता है। यह पुष्कर में भी दुर्लभ होता है। प्राचीन मान्यता के अनुसार सांय बेला में इसी दिन भगवान का मत्स्यावतार हुआ था। इस पर्व पर किए गए दान कार्य का फल दस यज्ञ के समान होता है। इसी दिन शिव त्रिपुरारि बने थे। शिव ने इस दिन त्रिपुर नामक असुर को मारा था। प्राचीन साहित्य के अनुसार देवताओं की रक्षा के लिए शिव को यह कार्य करना पडा था। त्रिपुर ने एक लाख वर्ष तक तीर्थराज प्रयाग में कठोर तप साधना की। उसके तेज चराचर प्राणी भस्मीभूतहोने लगे देवताओं ने अप्सराओं को भेजकर भी असफलता ही पायी। ब्रह्मा के आने पर उसने अमर होने का वरदान मांगा। ब्रह्माजीने असमर्थता व्यक्त की तो उसने मनुष्य या देव द्वारा मरने का वरदान मांगा।

फिर क्या था? त्रिपुर देवों को अपने द्वार रक्षक के रूप में रखने लगा। सूर्य का भी अपमान करने से नहीं चूका। सूर्य ने उसके नगर को अपने प्रताप से भस्म कर दिया। नारद मुनि भ्रमण करते हुए त्रिपुर के यहां पहुंचे। त्रिपुर ने स्वागत के अनन्तर नारद से पूछा-मेरे समान क्या कोई दूसरा प्रतापी असुर है। नारद के इनकार करने पर त्रिपुर का अहं बढ गया। नारद जी देवलोक में पहुंचकर यह सब बताया। ब्रह्मा इन्द्र मिलकर भगवान विष्णु के पास गए। क्षीर सागर पहुंचने पर विष्णु ने बताया कि ब्रह्मा ही सबके दुख देने वाले हैं। ब्रह्मा का त्रिपुर ने वरदान पाया है। नारद ने बताया जो देवता, राक्षस, नर-नारी हो जिसके माता-पिता हों वही उसे मार पाएगा। विष्णु ने बताया यह सब शंकर जी में है, उनसे सब मिलकर प्रार्थना करें। देवताओं की प्रार्थना पर शिव त्रिपुर का वध करने के लिए तैयार हो गए। नारद से जानकर त्रिपुर ने महादेव के कैलाश पर्वत पर आक्रमण कर दिया। त्रिपुर और शंकर में संघर्ष बढ गया। शिव धनुष से जिन असुरों को मारते थे, वे त्रिपुर के विमान में रखे अमृतकुण्डमें स्नान कर पुनर्जीवित हो उठते थे। महादेव विपत्ति में पड गए।

विष्णु और ब्रह्मा बछडे तथा गाय का रूप बनाकर त्रिपुर के विमान में पहुंच गये। अमृत रक्षक दोनों को देखकर सम्मोहित हुए। दोनों ने सारा अमृत पी डाला। लौटने पर शिव ने सारी बात बताने पर शिव ने पुन:वाणों द्वारा असुर कुल के साथ त्रिपुर की त्रयपुरीको भी विनष्ट कर दिया। त्रिपुर के वध का कारण ही शिव को त्रिपुरारि नाम दिया गया। इसी स्मृति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। भारतीयता की यह अनूठी पहचान है। कार्तिक मास में धर्मनिष्ठ नारियां नदी सरोवर या जलाशयों में स्नान से संबंधित प्रेरक प्रसंग मालवीलोकगीतों में प्रस्तुत करतीं हैं। सांय काल कार्तिक स्नान के अनंतर पूजा-अर्चना के आयाम से जुडी है।

गंगा, सरयू, गोमती तट पर अनगिनत दीप समस्त लोकसंस्कृतिके ज्योतिपुंजबनते हैं। श्रीकृष्ण के भक्ति गीतों से आते-प्रोत कार्तिकमासपूर्णिमा का पर्व अनन्य भक्ति भावना का अजस्त्र स्त्रोत है। स्त्रियां कार्तिकमासमें नंगे पैर पुष्पार्जनके निमित्त प्रात:उठकर शिप्रा,गंगा, सरयू या पास की नदी में स्नान करतीं हैं।

इसके बाद विप्रों द्वार उपासना की विशिष्ट परंपरा है। धर्म निष्ठ नारियां भक्ति भावनाओं द्वारा सत्य, कर्म का पालन करती हैं। अशक्त वृद्ध श्रद्धालुओं को कार्तिक पूर्णिमा जीवन्ततादेती है। कार्तिक मास की पूर्णिमा भक्ति भावना की असीम धारा अध्यात्म नव संदेश भी देता है।

डा हरिप्रसाद दुबे

सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

आज सोमवार - नवरात्रि का संयोग..ये शिव-देवी मंत्र बनाएंगे धन व सुख संपन्न



शास्त्रों के मुताबिक शिव जगतपिता तो आदि शक्ति जगतजननी या माता हैं। शिव को सत्य स्वरूप व सत्य का जीवन में उतरना ही शक्ति संपन्नता का रहस्य माना गया है। यही कारण है कि शिव उपासना शक्ति साधना के बिना व शक्ति पूजा शिव भक्ति के बिना अधूरी मानी गई है।

अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में शिव के बाएं भाग में देवी स्वरूप हो या काली के पैरों में शिव का स्वरूप भी शिव-शक्ति की महिमा उजागर करता है। सार यही है कि अगर शिव की भांति कल्याण भाव जीवन में उतारें तो सबल बनने में वक्त नहीं लगता यानी शक्ति भी स्वत: ही प्राप्त हो जाती है।

यही कारण है कि शक्ति साधना के काल नवरात्रि में सोमवार के दिन शक्ति के साथ शिव उपासना बहुत मंगलकारी मानी गई है। क्योंकि इस दिन शक्ति व शिव के विशेष मंत्रों का ध्यान सुख, वैभव की कामना को पूरी कर दरिद्रता का अंत करने वाला माना गया है। जानते हैं यह विशेष मंत्र व पूजा विधि-

- प्रात: स्नान के बाद शिव व देवी की मूर्तियों को जल व पंचामृत से स्नान के बाद  शिव को चंदन, अक्षत, बिल्वपत्र व सफेद पकवान का भोग व देवी को लाल चंदन, लाल फूल, लाल वस्त्र व लाल फलों का भोग लगाकर नीचे लिखें शिव मंत्र व देवी के बीज मंत्रों का रुद्राक्ष या स्फटिक की माला से यथाशक्ति या कम से कम एक माला जप वैभवशाली जीवन की कामना से करें -

- शिव मंत्र -

ऊँ साम्ब सदाशिवाय नम:

देवी बीज मंत्र -

ऊँ दुं दुर्गायै नम:

या

ऊँ ऐं ह्रीं क्ली दुं दुगायै नम:

- शिव-शक्ति की पूजा व मंत्र जप के बाद आरती करें और कर्म, वचन, आचरण के दोषों के लिये क्षमा प्रार्थना करें।
source: dainik bhaskar

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

...इसलिए देवी को कहते हैं दुर्गा



पुरातन काल में दुर्गम नामक दैत्य हुआ। उसने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर सभी वेदों को अपने वश में कर लिया जिससे देवताओं का बल क्षीण हो गया। तब दुर्गम ने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। तब देवताओं को देवी भगवती का स्मरण हुआ। देवताओं ने शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ तथा चण्ड-मुण्ड का वध करने वाली शक्ति का आह्वान किया।

देवताओं के आह्वान पर देवी प्रकट हुईं। उन्होंने देवताओं से उन्हें बुलाने का कारण पूछा। सभी देवताओं ने एक स्वर में बताया कि दुर्गम नामक दैत्य ने सभी वेद तथा स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया है तथा हमें अनेक यातनाएं दी हैं। आप उसका वध कर दीजिए। देवताओं की बात सुनकर देवी ने उन्हें दुर्गम का वध करने का आश्वासन दिया। यह बात जब दैत्यों का राज दुर्गम को पता चली तो उसने देवताओं पर पुन: आक्रमण कर दिया। तब माता भगवती ने देवताओं की रक्षा की तथा दुर्गम की सेना का संहार कर दिया।  सेना का संहार होते देख दुर्गम स्वयं युद्ध करने आया।

तब माता भगवती ने काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला आदि कई सहायक शक्तियों का आह्वान कर उन्हें भी युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। भयंकर युद्ध में भगवती ने दुर्गम का वध कर दिया। दुर्गम नामक दैत्य का वध करने के कारण भी भगवती का नाम दुर्गा के नाम से भी विख्यात हुआ।

source: dainikbhaskar

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

Family Photo II

YAGYA


YAGYA
Rishabh
Puja Sthal
Puja Sthal

Pravachan