सोमवार, 9 जुलाई 2012

चल पड़े कांवरिये


इस महीने में हरिद्वार की गंगा और कामना ज्योतिर्लिग के नाम से जाना जानेवाला सुप्रसिद्ध तीर्थस्थल देवघर की महिमा और भी बढ़ जाती है। शिव और शक्ति का सगम स्थल देवघर आदिकाल से ही पूजित है। वैसे तो सालभर तीर्थयात्री बाबा का जलाभिषेक करने देवघर पहुंचते है, लेकिन सावन की छटा कुछ अलग है। सावन में बाबा को जल चढ़ाने का अलग महत्व है। इसलिए एक महीने तक बाबाधाम में देश-विदेशों के कावरिये सुल्तानगज से कावर लिए बाबाधाम पहुचते है। इसके अलावा हरिद्वार में भी एक महीने तक कांवरिये का तांता लगा रहता है।

सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है। सत्य अर्थात भगवान विष्णु, शिव अर्थात मंगलकारी और दोनों का एक-दूसरे के प्रति समर्पित भाव ही सृष्टि की सुंदरता है। शिव के प्रति अपना समर्पण दिखाने के लिए भगवान राम ने ही कावर उठाने की परंपरा शुरू की थी। रावण की मौत के बाद शिव और राम में संघर्ष हुआ। दोनों तो बाद में मिल गए परंतु शिव के भूत-प्रेत और राम के रीछ-वानर आपस में झगड़ते रहे। इस झगड़े को शात कराने के लिए भगवान राम ने कई स्थानों पर शिव की पूजा की। सुल्तानगंज की उत्तरवाहिनी गंगा से जल भर कर कावर ले अपनी अद्र्धागिनी सीता, हनुमान और चारों भाइयों के साथ उन्होंने रावणेश्‌र्र्वर महादेव पर जल चढ़ाया। तब से श्रावण माह में सुल्तानगंज से जल भर कर देवघर जाने की परंपरा शुरू हो गई। ऐसा माना जाता है कि सर्वप्रथम कावर परंपरा की शुरुआत मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने ही की थी। रामायण काल से जुड़े स्थलों की खोज में लगी श्री रामायण रिसर्च कमेटी की टीम के अनुसार रावण के वध के उपरात भगवान श्रीराम ने लंका में शिवलिंग की स्थापना की थी जिसे आज मानवरी रामलिंगम के नाम से जाना जाता है।
श्रावण मास में शिव को गंगाजल चढ़ाने के पीछे भी एक रहस्य है। इसी मास में समुद्र मंथन से निकले हलाहल का भगवान शिव ने पान किया था। उसकी जलन को दूर करने के लिए सावन में भगवान शिव को गंगाजल चढ़ाने की परंपरा चल रही है, इसी कारण भगवान राम ने भी कावर ढोने की परंपरा की शुरुआत सावन में ही की थी। रावण हरिद्वार से गंगाजल लाकर भगवान शिव को अर्पित करता था, लेकिन सुल्तानगंज-देवघर कावरिया पथ को अमर बनाने के लिए भगवान राम का नाम लिया जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार जो नर-नारी कावर लेकर भगवान शिव को गंगाजल चढ़ाते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। राम की शिवभक्ति के पीछे के कारणों की चर्चा के दौरान रामधारी सिंह दिनकर के संस्कृति के चार अध्याय की चर्चा करना प्रासंगिक होगा।

पहले शैव और वैष्णव संप्रदाय के लोग एक-दूसरे को फूटी आख भी नहीं देखना चाहते थे। वाल्मीकि रामायण में भी भगवान शिव और विष्णु के बीच हुए युद्ध की चर्चा है। भगवान राम ने समाज में समरसता कायम करने के लिए शिवभक्ति की परंपरा शुरू की। रामचरितमानस में भी तुलसीदास ने भगवान राम से कहलवाया है-शिव द्रोही मम शत्रु कहावा।
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सावन सोमवार : हर हर भोले नम: शिवाय


सावन और शिव का भारतीय संस्कृति से गहरा मेल है। सावन के झूलों से लेकर सावन सोमवार की बेलपत्री तक..सब कुछ मानो भावनाओं को हरा-भरा कर देने वाला। सावन के आते ही शिव भक्तों में पूजा अर्चना के लिए नई उमंग का संचार हो गया है। चारों ओर गूंजने लगे हैं बोल बम.. के जयकारे और हरे व केसरिया रंग से धरती पट सी गई है। सावन सोमवार को शिवालयों में सुबह से शाम तक भक्तों का तांता लगा रहेगा। हर कोई भोले से वरदान मांगने पहुंच जाता है उनके द्वार। शास्त्रों और पुराणों का कहना है कि श्रावण मास भगवान शंकर को अत्यंत प्रिय है। इस माह में शिवार्चना के लिए प्रमुख सामग्री बेलपत्र और धतूरा सहज सुलभ हो जाता है। सच पूछा जाए तो भगवान शिव ही ऐसे देवता है, जिनकी पूजा-अर्चना के लिए सामग्री को लेकर किसी प्रकार की परेशानी नहीं होती। अगर कोई सामग्री उपलब्ध न हो तो जल ही काफी है। भक्ति भाव के साथ जल अर्पित कीजिए और भगवान शिव प्रसन्न।
जल चढ़ाओ और जो चाहे मांग लो
शास्त्रों के अनुसार श्रावण मास भगवान शकर को विशेष प्रिय है। अत: इस मास में आशुतोष भगवान शकर की पूजा का विशेष महत्व है। सोमवार शकर का प्रिय दिन है। इसलिए श्रावण सोमवार का और भी विशेष महत्व है। भगवान शकर का यह व्रत सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इस मास में लघुरुद्र, महारुद्र अथवा अतिरुद्र पाठ करके प्रत्येक सोमवार को शिवजी का व्रत किया जाता है। प्रात: काल गगा या किसी पवित्र नदी सरोवर या घर पर ही विधि पूर्वक स्नान करने का विधान है। इसके बाद शिव मदिर जाकर या घर में पार्थिव मूर्ति बना कर यथा विधि से रुद्राभिषेक करना अत्यत ही फलदायी है। इस व्रत में श्रावण महात्म्य और विष्णु पुराण कथा सुनने का विशेष महत्व है।

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शनिवार, 30 जून 2012

इस उपाय से श्री हनुमान पूजा करेगी मुसीबतों का सूपड़ा साफ


मन, शरीर और विचारों के जरिए जीवन और काम के प्रति सत्य व समर्पण की भावना मजबूत करने के लिये शनिवार या मंगलवार को श्री हनुमान पूजा बहुत शुभ फल देने वाली मानी गई है।

अगर आप भी सफलता और सुख की हर चाहत को पूरा करना चाहते हैं, तो हर कलह व मुसीबतों को दूर करने के लिए यहां बताया जा रहा श्री हनुमान उपासना का यह सरल उपाय विशेष मंत्र बोलते हुए करें |
 श्री हनुमान की पूजा में कुंकुम, अक्षत, फूल, नारियल, लाल वस्त्र और लाल लंगोट के साथ ही खासतौर पर सिंदूर और चमेली का तेल चढ़ाने का महत्व है। इस खास उपाय को करने के लिए अगली तस्वीर के साथ बताया जा रहा तरीका अपनाएं |

श्री हनुमान सिंदूर की चोला चढ़ी प्रतिमा को पवित्र जल से स्नान कराएं। इसके बाद थोड़े से चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर या सीधे प्रतिमा पर हल्का सा तेल लगाकर यह मंत्र विशेष बोलते हुए सिंदूर का चोला चढ़ा दें- सिन्दूरं रक्तवर्णं च सिन्दूरतिलकप्रिये। भक्तयां दत्तं मया देव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम।। - इसके बाद सभी पूजा सामग्री चढ़ाकर श्री हनुमान चालीसा पाठ करें या सुनें। गुग्गल धूप व तेल के दीप से श्री हनुमान की आरती करें व दु:खों की मार से रक्षा की प्रार्थना करें। अगली तस्वीर के साथ जानिए ऐसी हनुमान उपासना के क्या शुभ प्रभाव होते हैं  |

श्री हनुमान की ऐसी उपासना हर रोज़ भी करें तो मन में पैदा ईश्वर व खुद के प्रति विश्वास व्यावहारिक रूप से सोच व सेहत को भी बेहतर बनाने वाला साबित होता है। इनके जरिए ही मनचाही सफलता व यश पाने की चाहत पूरी करना आसान हो जाता है।

शनिवार, 5 मई 2012

5 मई की रात से 3 ग्रह एक साथ बनाएंगे तिकड़ी


आज 5 मई की रात 11 बजे बाद बुध ग्रह मेष राशि में जा रहा है। ये अभी तक नीच का था। मेष राशि में अभी गुरु एवं सूर्य पहले से स्थित हैं। अब बुध, गुरु और सूर्य तीनों ग्रहों की तिकड़ी बनेगी। 5 मई के बाद 21 मई 2012 की रात 9 बजकर 25 मिनट पर बुध वृषभ राशि में प्रवेश करेगा।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित मनीष शर्मा के अनुसार सूर्य, बुध और गुरु  एक साथ मेष राशि में रहेंगे। मेष राशि,मंगल के स्वामित्व वाली राशि है तथा इन तीनों ग्रहों से ही मंगल मित्र भाव रखता है। इन ग्रहों और इस भाव पर उच्च के शनि की दृष्टी भी बनी रहेगी शनि का भी बुध से सम भाव होने के कारण किसी प्रकार के प्राकृतिक आपदाओं से जनहानी की संभावनाएं कम हो जाएगी। आंतकवादियों की योजनाएं असफल होंगी। बुद्धि के क्षेत्र में कार्य करने वालों को विशेष सफलताएं मिलेगी। इस काल में रिलिज होने वाली फिल्में भी सफल होंगी तथा व्यापार में भी भारत को सफलताएं मिलेंगी।

पं. शर्मा ने बताया कि इस काल में जन्म लेने वाले बच्चे स्फूर्तीवान, धार्मिक एवं बुद्धिमान होंगे। ये बच्चे कई प्रकार के कार्य करने में होशियार रहेंगे तथा सभी के प्रिय होंगे।

साभार - दैनिक भास्कर

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

जाने सफलता और असफलता का रहस्य |

क्या आपकी कोई समस्या, परेशानी, दिक्कत आपको सता रही है? या आप कोई कार्य करना चाहते हैं और उसमें सफलता को लेकर संशय है, या कोई एग्जाम देना है, और आप सोच रहे हैं उसमें सफलता मिलेगी या नहीं, ऐसे हर सवाल के लिए यहां एक यंत्र दिया जा रहा है, जिसकी मदद से आपको अपने कार्य की सफलता-असफलता की ओर इशारा मिलेगा-
प्रश्न करने की विधि- अपनी समस्या या प्रश्न सोचकर अपने आराध्य देव का नाम लेकर आंख बंद करें और अपने कम्प्यूटर के माउस कर्शर के पॉइन्ट को यंत्र के ऊपर घुमाएं और कुछ देर बार माउस रोककर देखें कि कर्शर किस अंक पर है, उसी अंक का उत्तर आपके प्रश्न का उत्तर होगा।


१ . प्रश्न उत्तम है, कार्य पूर्ण होने की पूरी संभावना है।
२ . आराध्य देव की पूजा करके कार्य शुरू करें, सफलता निश्चित मिलेगी।
३. इस कार्य का परिणाम गड़बड़ हो सकता है।
४ . आपने कार्य के लिए जो रास्ता चुना है, उसे बदलकर नए तरीके से कार्य करें, सफलता अवश्य मिलेगी।
५ . कार्य में सफलता संभावित है। कार्य भगवान पर छोड़ दें।
६ . और अधिक प्रयत्न करने की जरूरत है, सफलता निश्चित ही मिलेगी।
७. कार्य में कई परेशानियां आएंगी परंतु कार्य पूर्ण हो जाएगा।
८. कार्य कठिनाइयों से भरा है, सफलता की उम्मीद कम है।
९. इस कार्य में शत-प्रतिशत सफलता मिलेगी।

शनिवार, 17 मार्च 2012

एकादशी

हिन्दू धर्म (पंचांग) के हिसाब  से हर महीने में २ एकादशी होती हैं। पूर्णिमा और अमावस्या के दस दिन बाद ग्यारहवीं दिन की तिथि एकादशी कहलाती है। पुण्य संचय करने में एकादशी  व्रत का बहुत ज्यादा महात्तम है। सभी एकादशी का अपना अलग-अलग महत्त्व है। 
                                           
                                       एकादशी वर्त (२०१२)

४ -५  जनवरी २०१२ - पुत्रदा/वैकुण्ठी एकादशी  
१९  जनवरी २०१२ -  षटतिला एकादशी  
३  फरवरी २०१२ - जया एकादशी 
१७ -१८  फरवरी २०१२ -  विजया एकादशी
४  मार्च २०१२ - आमलकी एकादशी 
१८  मार्च २०१२ - पापमोचनी एकादशी  
३  अप्रेल २०१२  - कामदा एकादशी
 १६ -१७  अप्रेल २०१२ - वरुथिनी एकादशी 
 २ मई २०१२ - मोहिनी एकादशी 
 १६  मई २०१२ - अपरा एकादशी 
  १  जून २०१२ - निर्जला एकादशी 
  १५  जून २०१२ - योगिनी एकादशी 
   ३०  जून २०१२ - देवशयनी एकादशी 
   १४  जुलाई २०१२ -  कामिका एकादशी
    २१  जुलाई २०१२ - पुत्रदा/पवित्रा एकादशी 
    १३  अगस्त २०१२ - अजा एकादशी
    २७  अगस्‍त २०१२  - पद्मिनी एकादशी
    १२ सितंबर २०१२  - परमा एकादशी
    २६  सितंबर २०१२ - पदमा एकादशी 
    ११  अक्‍टूबर २०१२ -  इन्दिरा एकादशी 
     २५ अक्टूबर २०१२  - पापांकुशा एकादशी
     १०  नवंबर २०१२ - रमा एकादशी 
     २४  नवंबर २०१२ - प्रबोधिनी / देव उठनी एकादशी
    ९ -१०  दिसंबर २०१२ - उत्पत्ति एकादशी
      २३ -२४  दिसंबर २०१२ - मोक्षदा एकादशी 

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

कार्तिक पूर्णिमा के दिन शिव त्रिपुरारि बने

भारतीय संस्कृति में कार्तिक मास की पूर्णिमा का धार्मिक एवं आध्यात्मिक माहात्म्य है। दीपावली, यम द्वितीया और गोवर्धनपूजा के अलावा इस मास के सांस्कृतिक पर्वो में यह पर्व असीम आस्था का संचार करता है। वर्ष के बारह महीनों में यह कार्तिक मास धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से विशेष महत्व का है। इसे त्रिपुरीपूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान तथा दीपदान की प्राचीन परम्परा है। अयोध्या में सरयू में स्नान करने के लिए जन-समुद्र उमड पडता है। सूर्यास्त काल में सरयू तट पर दीप पंक्तियां मनोहारी लगती है। गंगातटपर अनगिनत नर नारी श्रद्धाभिभूतहोकर अवगाहन लगाते हैं। हरिद्वार, काशी, प्रयाग, राजघाट, गढमुक्तेश्वर,विदुरकुटीकानपुर, अनूप शहर में गंगा में स्नान कर अपार जनमानस आह्लादितहोता है।

कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन कृतिका नक्षत्र रहने पर महाकार्तिकीपूर्णिमा का अटूट विश्वास है। भरणी नक्षत्र में पडने पर विशेष फलदायक एवं रोहिणी नक्षत्र के रहने पर इस महापर्वका फल और संविर्द्धतहो जाता है। इस दिन कृत्तिका चन्द्रमा और विशाखाका सूर्य होने पर पदमकयोग रहता है। यह पुष्कर में भी दुर्लभ होता है। प्राचीन मान्यता के अनुसार सांय बेला में इसी दिन भगवान का मत्स्यावतार हुआ था। इस पर्व पर किए गए दान कार्य का फल दस यज्ञ के समान होता है। इसी दिन शिव त्रिपुरारि बने थे। शिव ने इस दिन त्रिपुर नामक असुर को मारा था। प्राचीन साहित्य के अनुसार देवताओं की रक्षा के लिए शिव को यह कार्य करना पडा था। त्रिपुर ने एक लाख वर्ष तक तीर्थराज प्रयाग में कठोर तप साधना की। उसके तेज चराचर प्राणी भस्मीभूतहोने लगे देवताओं ने अप्सराओं को भेजकर भी असफलता ही पायी। ब्रह्मा के आने पर उसने अमर होने का वरदान मांगा। ब्रह्माजीने असमर्थता व्यक्त की तो उसने मनुष्य या देव द्वारा मरने का वरदान मांगा।

फिर क्या था? त्रिपुर देवों को अपने द्वार रक्षक के रूप में रखने लगा। सूर्य का भी अपमान करने से नहीं चूका। सूर्य ने उसके नगर को अपने प्रताप से भस्म कर दिया। नारद मुनि भ्रमण करते हुए त्रिपुर के यहां पहुंचे। त्रिपुर ने स्वागत के अनन्तर नारद से पूछा-मेरे समान क्या कोई दूसरा प्रतापी असुर है। नारद के इनकार करने पर त्रिपुर का अहं बढ गया। नारद जी देवलोक में पहुंचकर यह सब बताया। ब्रह्मा इन्द्र मिलकर भगवान विष्णु के पास गए। क्षीर सागर पहुंचने पर विष्णु ने बताया कि ब्रह्मा ही सबके दुख देने वाले हैं। ब्रह्मा का त्रिपुर ने वरदान पाया है। नारद ने बताया जो देवता, राक्षस, नर-नारी हो जिसके माता-पिता हों वही उसे मार पाएगा। विष्णु ने बताया यह सब शंकर जी में है, उनसे सब मिलकर प्रार्थना करें। देवताओं की प्रार्थना पर शिव त्रिपुर का वध करने के लिए तैयार हो गए। नारद से जानकर त्रिपुर ने महादेव के कैलाश पर्वत पर आक्रमण कर दिया। त्रिपुर और शंकर में संघर्ष बढ गया। शिव धनुष से जिन असुरों को मारते थे, वे त्रिपुर के विमान में रखे अमृतकुण्डमें स्नान कर पुनर्जीवित हो उठते थे। महादेव विपत्ति में पड गए।

विष्णु और ब्रह्मा बछडे तथा गाय का रूप बनाकर त्रिपुर के विमान में पहुंच गये। अमृत रक्षक दोनों को देखकर सम्मोहित हुए। दोनों ने सारा अमृत पी डाला। लौटने पर शिव ने सारी बात बताने पर शिव ने पुन:वाणों द्वारा असुर कुल के साथ त्रिपुर की त्रयपुरीको भी विनष्ट कर दिया। त्रिपुर के वध का कारण ही शिव को त्रिपुरारि नाम दिया गया। इसी स्मृति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। भारतीयता की यह अनूठी पहचान है। कार्तिक मास में धर्मनिष्ठ नारियां नदी सरोवर या जलाशयों में स्नान से संबंधित प्रेरक प्रसंग मालवीलोकगीतों में प्रस्तुत करतीं हैं। सांय काल कार्तिक स्नान के अनंतर पूजा-अर्चना के आयाम से जुडी है।

गंगा, सरयू, गोमती तट पर अनगिनत दीप समस्त लोकसंस्कृतिके ज्योतिपुंजबनते हैं। श्रीकृष्ण के भक्ति गीतों से आते-प्रोत कार्तिकमासपूर्णिमा का पर्व अनन्य भक्ति भावना का अजस्त्र स्त्रोत है। स्त्रियां कार्तिकमासमें नंगे पैर पुष्पार्जनके निमित्त प्रात:उठकर शिप्रा,गंगा, सरयू या पास की नदी में स्नान करतीं हैं।

इसके बाद विप्रों द्वार उपासना की विशिष्ट परंपरा है। धर्म निष्ठ नारियां भक्ति भावनाओं द्वारा सत्य, कर्म का पालन करती हैं। अशक्त वृद्ध श्रद्धालुओं को कार्तिक पूर्णिमा जीवन्ततादेती है। कार्तिक मास की पूर्णिमा भक्ति भावना की असीम धारा अध्यात्म नव संदेश भी देता है।

डा हरिप्रसाद दुबे